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Baba Baidyanath: पुराणों में भी ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ का है उल्लेख, जानें कैसे हुई इसकी स्थापना

Updated at : 06 Jul 2023 1:38 PM (IST)
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Baba Baidyanath: पुराणों में भी ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ का है उल्लेख, जानें कैसे हुई इसकी स्थापना

ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति में ज्योति के उद्भव पर पूरा प्रकाश समाहित है. ज्योतिर्लिंग के परिशीलन का विकास ईस्वी पूर्व की शताब्दियों में हो गया था द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश दक्षिण भारत में ही है.

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Deoghar Baba Baidyanath Jyotirling: वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के धार्मिक स्वरुप को स्पष्ट करने के लिए ज्योतिर्लिंग संबंधी आधारभूत मान्यताओं की विवेचना जरूरी हो जाता है. ईसा से लगभग चार हजार वर्ष पूर्व लिंग पूजा प्रचलित थी. कुषाण, शैव मतावलंबी थे. खरोष्ठी लिपि में महरजस राजाधिराजस्य सर्वलोक ईश्वरस्य महेश्वरस्य विककदफिस लिखा पाया गया है. इससे स्पष्ट होता है कि उस समय के राजा भी शैवमतावलंवी थे और शिव की उपासना के क्षेत्र में शिव के ईश्वर और महेश्वर नाम को लोकप्रियता मिली थी. कनिष्क के तांबे के सिक्के के पिछले भाग पर शिवमूर्ति व यूनानी लिपि में ओइस्ते लिखा रहता था. लिंगपूजा का प्रचलन बुद्ध के पूर्व भी था.

ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति में ज्योति के उद्भव पर पूरा प्रकाश समाहित है. ज्योतिर्लिंग के परिशीलन का विकास ईस्वी पूर्व की शताब्दियों में हो गया था द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश दक्षिण भारत में ही है. पूर्वी क्षेत्र में वैद्यनाथ, पश्चिम में सोमनाथ, नागेश और महाकाल हैं. उत्तर भारत के हिमवान पर्वत पर केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का प्रसिद्ध देवालय है. भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि ज्योर्लिंग के उन्नयन के पीछे भारतीय चेतना के सांस्कृतिक उन्नयन के उद्घोष है. शैवधर्म सबसे प्रायीन धर्म है. डॉ बारनेट की राय में द्रविड आर्यों के दास थे. लिंग पूजा करते थे.

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आर्यों में यह परंपरा पनपी नहीं थी किन्तु मोहनजोदड़ो से एक मुहर मिली जिस पर एक नर देवता की आकृति खुदी मिली है जिसे सर जॉन मार्शल ऐतिहासिक शिव की पूर्ववर्ती रुप मानते हैं क्योंकि यहां ऐसी अनेक मूर्तियां मिली है जो लिंगाकार है. इनसे लिंगोपासना का प्रतिपादन होता है लेकिन ज्योतिर्लिंग की चर्चा नहीं है. ऐसे ज्योतिर्मय पुरुष की कल्पना अवश्य है. शिवपुराण , स्कन्दपुराण और शिवरहस्य में ज्योतिर्लिंग का उल्लेख है. पुराणों के इतिहास समीक्षक केवल लिंग व स्कन्दपुराण को ही पुराण की कोटि में रखते हैं शेष को प्रामाणिकता की कसौटी पर आज भी कसा जा रहा है. पुराणों के निर्माण का समय चौथी से चौदहवीं शताब्दी तक के काल को माना जाता है.

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