वैद्यनाथपुर में ग्रामीणों ने प्रभारी प्रधानाध्यापक को बनाया बंधक, सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध प्रभात खबर

Updated at : 29 Jul 2018 4:16 AM (IST)
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वैद्यनाथपुर में ग्रामीणों ने प्रभारी प्रधानाध्यापक को बनाया बंधक, सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध प्रभात खबर

आशुतोष चतुर्वेदी य ह संयोग ही है कि आजकल जब बाबाधाम में हर ओर बम भोले का जयकारा गूंज रहा है, उस वक्त प्रभात खबर का देवघर संस्करण अपने 14 साल का सफर पूरा कर 15वें साल में प्रवेश कर रहा है. एक अखबार के लिए पाठकों का प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है. […]

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आशुतोष चतुर्वेदी
य ह संयोग ही है कि आजकल जब बाबाधाम में हर ओर बम भोले का जयकारा गूंज रहा है, उस वक्त प्रभात खबर का देवघर संस्करण अपने 14 साल का सफर पूरा कर 15वें साल में प्रवेश कर रहा है. एक अखबार के लिए पाठकों का प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि प्रभात खबर ने देवघर के लोगों के दिल में जगह बनाई है और वह पाठकों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है.
निष्पक्ष खबरों के साथ ही आधुनिकतम जानकारियों से अपने पाठकों को अवगत कराने का हमेशा प्रयास किया है. हमने देवघर के हर वर्ग के पाठकों का ध्यान में रखते हुए, यहाँ के संस्करण में स्वास्थ्य, महिलाओं और बच्चों, शिक्षा एवं धर्म-संस्कृति पर आधारित सामग्री देने की विशेष व्यवस्था की है.
सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ही प्रभात खबर की पत्रकारिता की पहचान रही है. उसकी टैगलाइन ‘अखबार नहीं आंदोलन’ यूं ही नहीं है. इसका एक पूरा इतिहास है. गांधीजी, जिसे समाज का अंतिम आदमी कहते थे, उस अंतिम आदमी के लिए यह अखबार हमेशा से मजबूती से खड़ा रहा है. दलित, पिछड़ों और आदिवासियों की आकांक्षाओं को प्रभात खबर ने ही हमेशा स्वर दिया है. जहां भी आम आदमी, समाज और राष्ट्र के विरुद्ध कुछ गलत दिखा, उसके खिलाफ हम एक मजबूत और निष्पक्ष चौथे स्तम्भ के रूप में डटे रहे. जिन घपलों-घोटालों को शासन-प्रशासन ने छुपाकर रखना चाहा, उसको सबके सामने उजागर किया.
इस कार्य में कई प्रकार की बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है, लेकिन हमें अपने पाठकों का नैतिक समर्थन हर बार मिला है. यह सच है कि मौजूदा दौर में खबरों की साख का संकट है. आपने गौर किया होगा कि सोशल मीडिया पर रोजाना कितनी सच्ची-झूठी खबरें चलतीं हैं. ऐसा नहीं है कि अखबारों में कमियां नहीं हैं. बाजार के दबाव में अखबार भी शहर केंद्रित हो गये हैं.
अखबार उन लोगों की अक्सर अनदेखी कर देते हैं जिन्हें उसकी सबसे अधिक जरूरत होती है. लेकिन प्रभात खबर ने हमेशा स्थानीय और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को स्वर देने का काम किया है और अपने सामाजिक दायित्व को बखूबी निभाया है. हमारा मानना है कि अखबार किसी मालिक या संपादक का नहीं होता है, उसका मालिक तो अखबार का पाठक होता है. पाठक की कसौटी पर ही अखबार की असली परीक्षा होती है. यात्रा के इस अहम पड़ाव में प्रभात खबर को आप सब की शुभकामनाओं की जरूरत है.
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