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Chaibasa News : सेरेंगसिया घाटी से हो लड़ाकों ने खदेड़ दी थी अंग्रेजी सेना

Updated at : 01 Feb 2026 11:50 PM (IST)
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Chaibasa News : सेरेंगसिया घाटी से हो लड़ाकों ने खदेड़ दी थी अंग्रेजी सेना

शहादत दिवस आज. 26 योद्धाओं के बलिदान की साक्षी है घाटी

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जगन्नाथपुर. पश्चिमी सिंहभूम स्थित सेरेंगसिया घाटी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक गौरवशाली अध्याय के रूप में दर्ज है. यह वही स्थान है, जहां 1837 में आदिवासी ‘हो’ समुदाय ने अंग्रेजों के खिलाफ पहली निर्णायक लड़ाई जीतकर ब्रिटिश हुकूमत को गहरा झटका दिया था. इतिहासकारों के अनुसार, यह अंग्रेजों के खिलाफ झारखंड की जनजातियों द्वारा किया गया पहला संगठित विद्रोह था, जिसमें सैकड़ों अंग्रेज सैनिक मारे गए, जबकि बाकी लोग अपनी जान बचाकर भाग गये. इस विद्रोह का नेतृत्व वीर योद्धा पोटो हो ने किया था. उनके साथ देवी हो, बुगनी हो, बेराई हो, पांडव हो, बोड़ो हो और नारा हो जैसे कई आदिवासी सरदारों ने अहम भूमिका निभायी थी. परंपरागत हथियार तीर-धनुष से लैस ‘हो’ लड़ाकों ने अंग्रेजी सेना का डटकर मुकाबला किया. इस भीषण संघर्ष में कोल्हान क्षेत्र के विभिन्न गांवों के 26 वीर योद्धा शहीद हो गये थे. इन बलिदानियों की याद में सेरेंगसिया घाटी में शहीद स्मारक का निर्माण किया गया. यह स्मारक आजादी के लिए आदिवासियों के संघर्ष और बलिदान की गाथा कहता है. हर वर्ष 2 फरवरी को यहां शहीद दिवस पर बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

1 जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर में दी गयी थी पोटो हो को फांसी:

कोल्हान विद्रोह के महानायक पोटो हो को 1 जनवरी 1838 को जगन्नाथपुर में मुख्य सड़क किनारे बरगद के पेड़ पर फांसी दी गयी थी. उन्हें फांसी देने वाले ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन थॉमस विल्किंसन को महज चार दिन पहले ही महारानी विक्टोरिया से फांसी देने का अधिकार प्राप्त हुआ था, जिसका प्रयोग उसने सबसे पहले पोटो हो के खिलाफ किया. फांसी के समय पोटो हो की उम्र लगभग 35 से 40 वर्ष थी. इसके बाद चार अन्य आदिवासी लड़ाकों को भी जगन्नाथपुर और सेरेंगसिया घाटी में फांसी दी गयी. पोटो हो की फांसी के साथ कोल्हान क्षेत्र में विद्रोह की गति धीमी हो गयी. हालांकि अन्य इलाकों में आंदोलन जारी रहा. इसी संघर्ष के बाद थॉमस विल्किंसन ने ‘हुकूकनामा’ के जरिये मानकी-मुंडा व्यवस्था को मान्यता दी.

वैतरणी नदी किनारे बनी थी अंग्रेजों को खदेड़ने की रणनीति

ब्रिटिश अत्याचार और लगान वसूली नीति से त्रस्त हो आदिवासी ‘हो’ लड़ाकों ने जगन्नाथपुर प्रखंड के पोकाम गांव के पास वैतरणी नदी किनारे गुप्त बैठक की थी. इस बैठक में अंग्रेजों से आर-पार की लड़ाई का फैसला लिया गया. इसमें पोटो हो सहित बेराई डेबाई, नारा हो, टोपाए, जोटो, पंडवा जोंकों, कोचे कुदरन सहित लालगढ़ और बड़पीढ़ क्षेत्र के 22 गांवों के सरदार शामिल हुए.

सेरेंगसिया घाटी में हुआ निर्णायक संघर्ष :

विद्रोह की भनक लगते ही 18 नवंबर 1837 को कैप्टन थॉमस के आदेश पर 400 सशस्त्र सैनिक, 200 पाइको और 60 घुड़सवार सैनिक सेरेंगसिया घाटी के रास्ते भेजे गए. अंग्रेजों की रणनीति से पहले से वाकिफ ‘हो’ लड़ाकों ने घाटी में घात लगाकर हमला किया. तीरों की बौछार से अंग्रेजी सेना में अफरा-तफरी मच गयी. दोनों ओर से जमकर संघर्ष हुआ, जिसमें 26 ‘हो’ योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए.

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ATUL PATHAK

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By ATUL PATHAK

ATUL PATHAK is a contributor at Prabhat Khabar.

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