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कड़ी सुरक्षा घेरा में रहनेवाले इनामी नक्सली किशन दा को कितना जानते हैं आप, जानें इनका सेफ जोन एरिया

माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य सह एक करोड़ का इनामी नक्सली किशन दा की सुरक्षा व्यवस्था काफी मजबूत है. इसके बाद भी पुलिस ने उसकी सुरक्षा घेरा को तोड़ते हुए गिरफ्तार किया है. किशन दा का सेफ जोन एरिया सारंडा क्षेत्र के सारूगढ़ा क्षेत्र माना जाता है.

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date
पश्चिमी सिंहभूम के टोंटो व गोइलेकरा स्थित सारूगढ़ा जंगल है किशन दा का सुरक्षित जोन.
पश्चिमी सिंहभूम के टोंटो व गोइलेकरा स्थित सारूगढ़ा जंगल है किशन दा का सुरक्षित जोन.
फाइल फोटो.

Jharkhand News (चाईबासा, पश्चिमी सिंहभूम) : कोल्हान व सारंडा क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहे माओवादी संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य सह एक करोड़ के इनामी प्रशांत बोस उर्फ किशन दा उर्फ बूढ़ा उर्फ मनीष के लिए टोंटो व गोइलकेरा प्रखंड के बीच पहाड़ों व जंगलों से घिरा सारूगढ़ा जंगल सुरक्षित जोन रहा है. इतना ही नहीं, सारूगढ़ा में नक्सलियों का प्रशिक्षण केंद्र भी आयोजित हुआ था. इसके बाद हाईलेवल बैठक होने वाली थी, लेकिन इससे पहले ही इनामी नक्सली पत्नी सहित गिरफ्तार हो गया.

सूत्रों की मानें, तो मौजूदा समय में भी इस क्षेत्र में नक्सलियों का जमावड़ा है. इस क्षेत्र से देश के विभिन्न हिस्सों से भी संगठन के नये लोग प्रशिक्षण लेने आये थे. करीब 20 दिन पहले प्रशिक्षण लेने आये हथियार बंद नक्सलियों को देख गांव के दो युवक ना केवल लकड़ियों को फेंक कर वहां से भाग खड़े हुए थे, बल्कि अब गांव का कोई भी व्यक्ति उक्त जंगल में लकड़ी लाने नहीं जा रहा है.

सूत्रों की मानें, तो पिछले दिन नक्सलियों की ट्रेनिंग खत्म हो गयी थी. साथ ही जल्दी बैठक होने वाली थी, लेकिन सरायकेला के कांड्रा से पुलिस द्वारा प्रशांत बोस व उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिये जाने से यह बैठक टल सकती है. सूत्रों के अनुसार, प्रशांत बोस के पोलित ब्यूरो के सदस्य होने के कारण सारंडा व कोल्हान जोन में काफी दबादबा है. शुरू में 3 लेबल के सुरक्षा घेरे में रहने वाले किशन दा की सुरक्षा घेरा नक्सलियों ने पिछले दो साल से बढ़ा दी थी.

ढाई साल पहले आया था लकवा का अटैक

सूत्रों के अनुसार, करीब ढाई साल पहले इनामी नक्सली प्रशांत बोस उर्फ किशन दा को लकवा का अटैक भी आया था. इससे वे चलने-फिरने में बिल्कुल असमर्थ हो गये थे. इस वजह से सुरक्षा के लिहाज से उन्हें पश्चिम सिंहभूम व ओड़िशा में फैले सारंडा जंगल के 'आजाद क्षेत्र' में लाया गया था. माना जा रहा है कि उक्त आजाद क्षेत्र पहाड़ी व जंगलों से घिरा सारूगढ़ा ही था. यहां पहाड़ियों पर कई गुफाएं भी हैं.

कहा जाता है कि पारसनाथ से सारंडा तक किशन दा को माओवादी कैडर कई नाम से जानते हैं. संगठन द्वारा उनका किशन दा उर्फ मनीष उर्फ बूढ़ा का नाम दिया गया था. वे पारसनाथ के पहाड़ियों में भी रहकर देश के कई हिस्सों में नक्सली घटना को अंजाम देते रहे हैं, लेकिन, उनकी शारीरिक स्थिति अच्छी नहीं रह गयी थी.

प्रशांत बोस अब तक झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र में हिंसा का खेल खेल चुके हैं. उनकी गिरफ्तारी के लिए झारखंड पुलिस के अलावा CRPF, NIA व एक खुफिया एजेंसी भी लगी हुई थी. उनपर बिहार को छोड़कर अन्य राज्यों में इनाम घोषित है.

सारंडा व कुचाई में लेते थे शरण

सूत्रों के अनुसार, पूर्व में किशन दा ने असीम मंडल उर्फ आकाश को कोल्हान समेत पश्चिम बंगाल व ओड़िशा में संगठन मजबूत करने की जिम्मेवारी सौंपी थी. पुलिस के समक्ष सरेंडर करने के बाद नक्सली एरिया कमांडर व 25 लाख का इनामी कान्हू मुंडा ने पुलिस को बताया था कि किशन दा माओवादी संगठन के सेंट्रल कमेटी के उप महासचिव हैं. कान्हू मुंडा ने पिछले 15 फरवरी को अपने दस्ते के 7 सदस्यों के साथ सरेंडर कर दिया था.

सूत्रों की मानें, तो पारसनाथ की पहाड़ियों में रहने के बाद जब प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के बुजुर्ग होने पर उन्हें सारंडा ले जाया गया था, लेकिन सारंडा पुलिस के बढ़ती दबिश के कारण संगठन के नक्सली सदस्यों ने उन्हें सरायकेला जिला अंतर्गत कुचाई ले गया था. यहीं से रहकर वो संगठन के विस्तार में लगे थे.

सारूगढ़ा बना सुरक्षित जोन

फिलहाल सारंडा से नक्सलियों का पांव लगभग पूरी तरह से उखड़ चुका है. ऐसे में नक्सलियों ने कोल्हान जंगल के सारूगढ़ा को ही सुरक्षित जोन मान रखा है. भौगोलिक दृष्टिकोण से यह काफी कठिन क्षेत्र है. वहां तक पहुंचने के ना तो अच्छी सड़क है और ना ही दुरूह क्षेत्र के नदी पर पुल है. वहीं यहां से आसानी से ओड़िसा क्षेत्र में भी प्रवेश किया जा सकता है. यही वजह है कि मौजूदा समय में भाकपा माओवादियों का यह इलाका सुरक्षा जोन बना हुआ है.

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