जिले में खेती पर संकट: न बीच मिल रहे न मजदूर, बादल भी दे रहे धोखा

Author Sunil kr sinha|Edited by Priya Gupta
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जिले में खेती पर संकट: न बीच मिल रहे न मजदूर, बादल भी दे रहे धोखा

पश्चिमी सिंहभूम में मजदूरों के पलायन और समय पर बीज न मिलने से किसान परेशान हैं। खेती पर मंडराते संकट और किसानों की समस्याओं पर विस्तृत रिपोर्ट पढ़ें।

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संवाददाता, चाईबासा

बीते कई दिनों से हो रही बारिश के बाद पश्चिमी सिंहभूम जिले में कृषि कार्य ने रफ्तार पकड़ी है. खेतिहर मजदूरों के पलायन करने के कारण किसानों को काम के लिए मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं. दरअसल, खेती के काम में मजदूरों को महज 100 से 150 रुपये की दिहाड़ी मिलती है, जिससे बढ़ती महंगाई के दौर में उनका गुजर-बसर करना मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि महिला और पुरुष मजदूर दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं. जहां पहले बिचड़ा लगाने के लिए 8-10 मजदूर आसानी से मिल जाते थे, वहीं अब सिर्फ 3-4 मजदूर ही मिल पा रहे हैं. मजदूरों के इस टोटे के कारण बिचड़ा लगाने का काम लक्ष्य से पिछड़ता जा रहा है.

विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष 10 जुलाई तक जिले में धान रोपाई का काम बेहद कम (0.48 प्रतिशत) हो पाया था, जबकि 7,726 हेक्टेयर में धान का बीज छींटा गया था. इस बार अब तक 5,178 हेक्टेयर में बिचड़ा लगाया गया है, जबकि 94,079 हेक्टेयर खेतों में धान बीज का छींटा लगाया जा चुका है. मौसम की बेरुखी और कम बारिश के कारण जिले के 1,68,625 किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गयी हैं.

समय पर नहीं मिलता सरकारी बीज, लैंपस पर उठ रहे सवाल

किसानों का आरोप है कि उन्हें स्थानीय लैंपस से समय पर धान का बीज नहीं मिल पाता है. वितरण की सूचना सार्वजनिक नहीं की जाती और महज एक-दो घंटे के लिए ही काउंटर खुलता है. इस वजह से कई बार लैंप्स का बीज खुले बाजार में बिकने की शिकायतें आती हैं. विवश होकर किसानों को बाजार से महंगे दाम पर बीज खरीदना पड़ता है. पैसे का जुगाड़ करने के लिए छोटे किसानों को अपने घर के मुर्गी, बत्तख और बकरी तक बेचने पड़ रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर रोपाई नहीं होने और छींटा विधि अपनाने से धान की पैदावार काफी कम हो जाती है.

किसानों का दर्द

लैंपस में समय पर बीज नहीं मिला, इसलिए पुराना धान ही बोना पड़ा. कम मजदूरी के कारण महिलाएं और युवा दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं, जिससे खेतों के लिए मजदूर गायब हैं.- सुभाष सावैंया (किसान)

जून में बारिश नहीं हुई और जुलाई में भी कम पानी गिरा है. हमारे लिए मॉनसून का देर से आना बड़ी आफत बन गया है. ऊपर से मजदूर भी नहीं मिल रहे.- विजय कुमार प्रधान (किसान)

इस बार सरकारी धान का बीज बहुत देर से आया और वह भी जरूरत के मुताबिक नहीं मिला. मजबूरी में कई किसानों को बाजार से महंगी खरीदारी करनी पड़ रही है.- ब्रजलाल लागुरी, (किसान)

खेतों में पानी न होने से काम समय पर शुरू नहीं हो सका. मुझे लैंपस से बीज नहीं मिला, इसलिए अब बाजार से बीज खरीदकर जैसे-तैसे खेती शुरू करने की तैयारी में हूं.- बबूल सावैंया (किसान)



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