बेरमो, जारंगडीह स्थित ढोरी माता तीर्थालय आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां देश के विभिन्न भागों से सभी धर्म व जाति के लोग आते हैं. कोयलांचल के श्रमिकों का इन पर अटूट विश्वास है. श्रमिकों का मानना है कि ढोरी माता उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हैं. प्रत्येक वर्ष अक्तूबर माह के अंतिम शनिवार तथा रविवार को यहां वार्षिकोत्सव का मुख्य कार्यक्रम होता है. इसमें भाग लेने के लिए झारखंड, बिहार, प बंगाल, ओड़िशा, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, चैन्नई, बंगलुरू, केरल, उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. विदेश से भी ईसाई धर्मावलंबी यहां आकर माता के समक्ष प्रार्थना करते हैं. राज्य के विभिन्न जिलों से लोग पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते हैं और माता मरियम के चरणों में मत्था टेकते हैं.
17 अक्टूबर से चल रहा है समारोह
ढोरी माता का वार्षिकोत्सव समारोह 17 अक्टूबर को झंडोत्तोलन के साथ शुरू हुआ. रोजाना मिस्सा पूजा, नोविनो प्रार्थना, प्रतिमा दर्शन, पाप स्वीकार आदि कार्यक्रम चल रहे हैं. 25 अक्टूबर को शाम को शोभा यात्रा निकाली जायेगी. इसी दिन माता मरियम के आदर में मिस्सा पूजा व प्रतिमा दर्शन होगा. 26 अक्टूबर को समारोही मिस्सा पूजा के साथ वार्षिकोत्सव समारोह का समापन होगा. समारोही मिस्सा पूजा में मुख्य अतिथि (मुख्य याजक) गुमला धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष लिनुस पिंगल एक्का डी डी तथा सह याजक हजारीबाग धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष आनंद जोजो डी डी होंगे. वार्षिकोत्सव समारोह को लेकर श्रद्धालुओं का जुटान शुरू हो गया है. पूरा तीर्थालय बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं से पट गया है. तीर्थालय प्रबंध समिति मिस्सा पूजा और लोगों के ठहरने की व्यवस्था में जुटी है. ढोरी माता तीर्थालय को आकर्षक ढंग से सजाया गया है. चर्च मैदान में बड़ा पंडाल बनाया गया है. पूरे जारंगडीह बाजार की रौनक बढ़ गयी है.खदान में कोयला काटने के दौरान मिली थी प्रतिमा
जानकारी के अनुसार बेरमो कोयलांचल की ढोरी कोलियरी (कोयला खदान) पहले पदमा राजा के पुत्र कामख्या नारायण सिंह के अधीन थी. ढोरी तीन नंबर खदान में रुपा सतनामी नामक एक मजदूर भी कोयला काटता था. 12 जून 1956 की सुबह मजदूरों के साथ वह कोयला काटने में व्यस्त था. लगातार गैंता चला रहा था. तभी उसे तीन बार ””गैंता धीरे चलाओ, मैं यहां उपस्थित हूं”” की आवाज सुनायी दी. इसे भ्रम मान कर वह गैंता चलाता रहा और कुछ देर बाद उसे देवी की एक प्रतिमा दिखायी दी. प्रतिमा का एक हाथ गैंता के प्रहार से टूट गया था. रुपा ने इसकी जानकारी अन्य मजदूरों को दी. इस प्रतिमा को ढोरी स्थित मजदूरों के कार्यालय में लाकर स्थापित कर दिया गया. धीरे-धीरे प्रतिमा मिलने की खबर फैल गयी और उच्चाधिकारियों को भी इसकी जानकारी दी गयी. जिस जगह प्रतिमा मिली थी, उसे मंदिर का रूप दे दिया गया. मंदिर में भीड़ जुटने लगी. ढोरी के तत्कालीन खान प्रबंधक ने प्रतिमा देखने के बाद कहा कि यह प्रतिमा काली की नहीं, बल्कि माता मरियम की है. प्रबंधन ने इसकी सूचना बोकारो थर्मल के ख्रिस्तीय पुरोहित को दी. पुरोहित अल्बर्ट भरभराकन ने इस प्रतिमा को देखा और इसकी सूचना अन्य ख्रिस्तीय विश्वासियों को दी. एक निश्चित दिन को उक्त प्रतिमा को जारंगडीह लाया गया. प्रतिमा के साथ काफी संख्या में श्रद्धालु पैदल वहां पहुंचे. जारंगडीह में लाने के बाद फादर अल्बर्ट ने ख्रिस्त भोग चढ़ाया. इस छोटे से समारोह के बाद प्रतिमा को जारंगडीह में स्थापित कर दिया गया. बाद में इसे गिरिजाघर का रूप दिया गया. वर्ष 1965-67 के बीच इस प्रतिमा को परीक्षण व शोध के लिए पुणे और मुंबई ले जाया गया. शोधकर्ताओं ने पाया कि कटहल की लकड़ी से बनी यह प्रतिमा सैकड़ों वर्ष पुरानी है, लेकिन अभी तक सुरक्षित है. मामले की जानकारी रांची महाधर्म प्रांत के तत्कालीन आर्च विशप पीयूष करकेट्टा को मिली तो उन्होंने प्रतिमा को अपने पास विशप हाउस मंगवाया. वर्ष 1964 में संत पॉल (छठा) के भारत आगमन पर जारंगडीह के ख्रिस्त सदस्य प्रतिमा को मुंबई ले गये. संत पॉल में प्रतिमा का दर्शन किया. 1970 में डाल्टेनगंज धर्मप्रांत के प्रथम विशप जार्ज सोपेन ने ढोरी माता की उपस्थिति तथा सभी तथ्यों से अवगत होकर ढोरी माता को पूरे डाल्टेनगंज धर्मप्रांत की संरक्षिका घोषित किया. इस परंपरा को द्वितीय विशप चार्ल्स सोरेन ने भी बनाये रखा.1983 में दिया गया तीर्थालय का रूप
प्रारंभ में ढोरी माता को जारंगडीह के एक छोटे से चर्च में रखा गया था. उस वक्त प्रत्येक रविवार को भक्ति समारोह होता था. एक बार श्रीलंका से फादर बेर्थालट जारंगडीह के ख्रिस्तीय समुदाय को विनती उपवास देने आये. ढोरी माता की चमत्कारी घटना सुनने के बाद उन्होंने विशेष प्रार्थना की. उसी समय से प्रत्येक वर्ष समारोह का आयोजन होने लगा. भीड़ को देखते हुए सीसीएल अधिकारियों के सहयोग से ढोरी माता गिरिजाघर व मैदान की व्यवस्था की गयी. वर्ष 1983 में फादर डेनियल की निगरानी में इसे तीर्थालय का रूप दिया गया. तीर्थालय के पल्ली पुरोहित फादर माईकल लकड़ा कहते हैं कि ढोरी माता न केवल श्रमिकों की संरक्षिका है, बल्कि वह सारी क्लीसिया एवं मानवजाति की संरक्षिका हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

