बोकारो : बीएसएल का निर्माण करने वाली कंपनी खुद के वजूद के लिए लड़ रही है लड़ाई

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बोकारो : बोकारो इस्पात संयंत्र को सबसे बड़ा स्वदेशी इस्पात कारखाना का दर्जा हासिल है. स्वदेशी के इस संदेश को मजबूती दी थी एचएससीएल (हिंदुस्तान स्टीलवर्क्स कंस्ट्रक्शन लिमिटेड) ने. बीएसएल प्लांट समेत सेक्टर निर्माण में एचएससीएल ने अग्रिम भूमिका निभायी थी. लेकिन, वर्तमान में एचएससीएल खुद की वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. आलम यह […]

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बोकारो : बोकारो इस्पात संयंत्र को सबसे बड़ा स्वदेशी इस्पात कारखाना का दर्जा हासिल है. स्वदेशी के इस संदेश को मजबूती दी थी एचएससीएल (हिंदुस्तान स्टीलवर्क्स कंस्ट्रक्शन लिमिटेड) ने. बीएसएल प्लांट समेत सेक्टर निर्माण में एचएससीएल ने अग्रिम भूमिका निभायी थी. लेकिन, वर्तमान में एचएससीएल खुद की वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. आलम यह है कि कभी 20 हजार से अधिक अधिकारी-कर्मचारी का प्रतिनिधित्व करने वाली कंपनी आज मात्र 534 अधिकारी व कर्मी के सहारे बाजार में टिके रहने की कोशिश कर रहा है.
सीआरएम 01 से सीआरएम 03 तक का सफर : एचएससीएल ने बोकारो इस्पात संयंत्र का आधारशिला मजबूत की थी. एचएससीएल ने अपने निर्माण वर्ष 1964 में ही बीएसएल सीआरएम 01 बनाने का काम शुरू किया. वर्तमान में भी बीएसएल का सीआरएम 03 का निर्माण भी एचएससीएल ने ही पूरा किया. 1964 से 1978 तक कंपनी पूरे उत्साह के साथ काम करता रहा. इस दौरान बोकारो-धनबाद की लाइफ लाइन तेलमच्चो पुल निर्माण भी एचएससीएल की ओर से किया गया. कई रेलवे पुल समेत देश के कई इंफ्रास्ट्रक्चर का काम किया. बीपीएससीएल का छाइ प्रबंधन भी एचएससीएल ही कर रहा है. 1978 के बाद कंपनी की स्थिति में गिरावट आने लगी.
1999 आते-आते कंपनी बीमार घोषित
1978 से एचएससीएल का बुरा वक्त शुरू होने लगा. एचएससीएल के पास ज्यादा काम होने के कारण भारी मात्रा में कर्मी-अधिकारी बीएसएल छोड़कर एचएससीएल ज्वाइन किया. लेकिन, 1978 आते-आते बीएसएल निर्माण (आधुनिकीकरण के पहले) कार्य पूरा हो गया. इससे एचएससीएल के पास काम की कमी हुई, जबकि मैनपावर ज्यादा हो गया. अंतत: 1999 में कंपनी को बीमार घोषित कर दिया. मैनपावर की अधिकता को दूर करने के लिए कंपनी ने 2000 से 2008 तक वीआरएस व सीआरएस स्कीम चलाया. 7000 लोग इस प्रक्रिया में कंपनी से दूर हो गये.
कर्मचारियों की छंटनी के बाद अचानक से कंपनी के पास काम बढ़ गया. लेकिन, मैनपावर की कमी खलने लगी. समस्या निदान के लिए कंपनी को सरकार की ओर से कांट्रेक्ट पर कर्मी-अधिकारी बहाल करने की छूट मिली. कम से कम वेतन में कांट्रेक्ट बेसिस पर अधिकारी-कर्मी रखे गये. इससे कंपनी का ऑपरेशन लाभ बढ़ा. 2015-16 में कंपनी को 08 हजार करोड़ का प्रोजेक्ट मिला. लेकिन पुराने कर्ज के कारण कंपनी की खस्ता हालत नहीं सुधर पायी. 25 मई 2016 के भारत सरकार के प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार सरकार ने एचएससीएल को 200 करोड़ का वन टाइम सपोर्ट दिया गया. वहीं वीआरएस व सीआरएस स्कीम में 110 करोड़ रुपया दिया गया. लेकिन स्थिति में सुधार नहीं आया.
मर्ज होने के बाद स्थिति बदत्तर
01 अप्रैल 2017 से कंपनी का नेशनल बिल्डिंग्‍स कन्‍स्‍ट्रक्‍शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनबीसीसी) में मर्ज हुई. 51 प्रतिशत शेयर एनबीसीसी व 49 प्रतिशत शेयर एचएससीएल के पास रहा. इसके बाद एनबीसीसी का एक्शन प्लान काम करने लगा. एचएससीएल के कांट्रेक्ट पर काम करने वाले अधिकारियों की माने तो मर्ज होने के बाद एचएससीएल की कार्यप्रणाली पर रोक लगा दी गयी. कंपनी को मिलने वाले फ्रेश टेंडर को मान्य नहीं किया जा रहा है. यहां तक की बोकारो इस्पात संयंत्र का काम भी एनबीसीसी की ओर से मान्य नहीं किया जा रहा है. इसका असर एचएससीएल पर हो रहा है. अभी तक 4000 करोड़ से अधिक का फ्रेश टेंडर को मान्य नहीं किया गया है.
कांट्रेक्ट कर्मी-अधिकारी ठगे गये !
कंपनी के मर्ज होने की खबर ने एचएससीएल के कांट्रेक्ट कर्मी-अधिकारी को उत्साहित किया था. ऐसे कर्मी-अधिकारी को लगा था कि अब पुराने वादा के अनुसार समान काम के लिए समान वेतन मिलेगा. साथ ही अन्य बुनियादी सुविधा भी मिलेगी. लेकिन नवंबर 2017 में कर्मियों का भ्रम टूट गया. विरोध में 04 से 10 नवंबर तक हड़ताल हुई. हड़ताल को बोकारो विधायक बिरंची नारायण के आश्वासन के बाद तोड़ दिया गया. मौखिक आश्वासन के बाद हड़ताल खत्म हुआ, लेकिन आज तक सुनवाई नहीं हुई. एचएससीएल कांट्रेक्टल इम्प्लॉयी एसोसिएशन ने दोबारा मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री के पास गुहार लगा कर न्याय की मांग की है. सुनवाई नहीं होने पर संसद का घेराव किया जायेगा.
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