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झारखंड विधानसभा चुनाव 2014 : विकास की डगर पर राज्य को ले जाने की चुनौती

Updated at : 23 Dec 2014 9:54 AM (IST)
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झारखंड विधानसभा चुनाव 2014 : विकास की डगर पर राज्य को ले जाने की चुनौती

रांची : झारखंड की चौथी विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनाव का शुरुआती रुझान आ गया है. शुरुआती दौर में राज्य की 81 सीटों में से 67 के रुझान आ गये हैं. इनमें भाजपा 32 सीटों पर, झारखंड विकास मोर्चा छह सीटों पर, कांग्रेस चार सीटों पर, राजद तीन सीटों पर, झारखंड मुक्ति मोर्चा […]

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रांची : झारखंड की चौथी विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनाव का शुरुआती रुझान आ गया है. शुरुआती दौर में राज्य की 81 सीटों में से 67 के रुझान आ गये हैं. इनमें भाजपा 32 सीटों पर, झारखंड विकास मोर्चा छह सीटों पर, कांग्रेस चार सीटों पर, राजद तीन सीटों पर, झारखंड मुक्ति मोर्चा 15 सीटों पर और अन्य सात सीटों पर आगे चल रहा है. अगर शुरुआती रुझान ही चुनाव परिणाम में परिणत हुआ तो यह मानना होगा कि भाजपा के नेतृत्व वाले गंठजोड़ को राज्य की जनता इस बार या तो स्पष्ट बहुमत देने जा रही है. नहीं तो कम से कम उन्हें सरकार बनाने का जनादेश मिलेगा.
भाजपा के आक्रामक चुनाव प्रचार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की काम करने वाले नेता की छवि और स्पष्ट बहुमत की सरकार देने की अपील राज्य में काम करती दिख रही है. पिछले 14 सालों में झारखंड अपने साथ अस्तित्व में आये राज्यों छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड से काफी पिछड़ गया है.
झारखंड विकास के पायदान पर अपने पड़ोसी पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा से काफी पिछड़ चुका है. संभवत: यह देश का इकलौता राज्य है, जहां की लगभग 45 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है. एक औद्योगिक राज्य होने के कारण यहां के शहरों में कुछ चमक -दमक दिख सकती है, लेकिन अगर आप शहर 10 से 15 किमी दूर किसी गांव में जायें तो यहां के आमलोगों की भयंकर गरीबी और पिछड़ेपन का सच समाने आ जायेगा. यहां तक कि यह राज्य अपने बजट की पूरी राशि भी खर्च नहीं कर पाता है.
ऐसे में भाजपा या झामुमो जिस गंठबंधन के नेतृत्व में भी अगली सरकार बनती है, उसके सामने इन्हीं सवालों को सुलझाने की चुनौती होगी. अगर भाजपा सत्ता में आती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए राज्य को एक प्रभावी नेतृत्व देना अहम चुनौती होगी. वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा अगर चुनाव में जीत हासिल करता है, तो उसके युवा नेतृत्व हेमंत सोरेन को इन चुनौतियों से पार पाना होगा.
महत्वपूर्ण बात यह कि भाजपा जहां आक्रामक राष्ट्रवादी तेवर, आदिवासियों के लिए खुद के द्वारा किये गये कामकाज, तीव्र विकास के दावे के साथ चुनाव मैदान में थी; वहीं झामुमो क्षेत्रीय अस्मिता, आदिवासियों के अधिकार, हेमंत सरकार के लगभग सवा साल के कामकाज के आधार पर मैदान में थी और शुरुआती रुझान तो यही बता रहे हैं कि झारखंडवासियों का सरोकार राष्ट्रवाद से भी है उतना ही है, जितना क्षेत्रीय अस्मिता की. ऐसे में अगर भाजपा सरकार में आती है तो उसे क्षेत्रीय अस्मिता का भी ख्याल रखना होगा और अगर झामुमो सरकार में आती है तो उसे एक राष्ट्रवादी नजरिया भी पेश करना ही होगा. उनकी दीर्घकालिक राजनीति के लिए यह जरूरी भी है.
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