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कदमा में ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा का अनावरण किया गया

Updated at : 26 May 2024 4:23 PM (IST)
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कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान परिसर में रविवार को ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा का अनावरण किया गया. इस उपलक्ष्य में रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया.

ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा का अनावरण किया

कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान परिसर में रविवार को ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा का अनावरण किया गया. इस उपलक्ष्य में रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया.

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जमशेदपुर:कदमा स्थित आदिवासी संताल जाहेरथान परिसर में रविवार को ओलचिकी लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा का अनावरण किया गया. इस उपलक्ष्य में रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया. प्रतिमा का अनावरण मुख्य अतिथि प्रोफेसर डा. हीरालाल मुर्मू एवं समाजसेवी सह रांची हाईकोर्ट के अधिवक्ता मदन मोहन सोरेन ने की. मौके पर मुख्य अतिथि प्रोफेसर डा. हीरालाल मुर्मू ने कहा कि रक्तदान महादान है. भारत में प्रथम विश्व युद्ध के समय 1942 में इसकी शुरूआत हुई थी. हमारे देश में हर साल करीब 5 करोड़ यूनिट रक्त की खपत होती है. रक्तदान को लेकर सुदूर ग्रामीण इलाकों में अभी भी जागरूकता का अभाव है. हाल के दिनों में आदिवासी समाज में रक्तदान को लेकर जागरूकता बढ़ी है. अब आदिवासी समाज आगे बढ़कर रक्तदान कर रहे है. यह समाज में बहुत बड़ा बदलाव है. उन्हाेंने कहा कि आदिवासी समाज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. समाज के युवा डाक्टर, इंजीनियर, आइएएस, आइपीएस, बैंकर्स समेत बिजनेस व्यवसाय के क्षेत्र में भी काबिज हो रहे हैं. निश्चय ही आने समय आदिवासी समाज के लिए स्वर्णिम होगा.
सरना धर्म को संवैधानिक मान्यता मिले
समाजसेवी मदन मोहन सोरेन ने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ओलचिकी को अविष्कार कर ऐतिहासिक काम किया. इससे इस धरती पर संताल समाज को एक अलग पहचान मिली है. संताल समाज के लोगों ने अपनी मातृभाषा संताली व उनकी लिपि ओलचिकी को तरजीह दी.नतीजतन वर्ष 2003 में संताली भाषा को भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया. अब ओलचिकी को जन-जन की भाषा बनाने की मुहिम चल रही है. लोग अपनी मातृभाषा संताली की लिपि ओलचिकी में पढ़ना-लिखना भी सीख रहे हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक पहचान के लिए लंबे समय में आवाज उठा रहे हैं. अभी उनके सरना धर्म को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पायी है. सरना धर्म को कोड नहीं मिलने से आदिवासी समाज का अस्तित्व खतरा में पड़ गया है. उन्होंने कहा कि तमाम आदिवासी संगठनों को एकजुट होकर सरना धर्म को मान्यता देने की आवाज उठनी चाहिए.
युवाओं ने रक्तदान शिविर में बढ़-चढ़कर भाग लिया
आदिवासी संताल जाहेरथान कमेटी की ओर से आयोजित रक्तदान-महादान कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर भाग लिया. शिविर में 59 यूनिट रक्त संग्रह किया गया. कमेटी के भुआ हांसदा ने बताया कि समाज के लोगों में रक्तदान के प्रति जागरूकता लाने के लिए मकसद से रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया. समाज के युवा स्वैच्छिक रूप से आगे बढ़कर रक्तदान कर रहे हैं. यह सकारात्मक बदलाव देखने को मिली है. उम्मीद है कि आने वाले समय में रक्तदाताओं की संख्या बढ़ेगी.
इन्होंने दिया सराहनीय योगदान
पंडित रघुनाथ मुर्मू की प्रतिमा अनावरण सह रक्तदान शिविर कार्यक्रम को सफल बनाने में वीबीडीए के टीम, रक्तदान के प्रेरक राजेश मार्डी, आदिवासी संताल जाहेरथन के भुआ हांसदा, विक्रम बास्के, पंचू हांसदा, सुनाराम टुडू, विकास हेंब्रम, अर्जुन सोरेन, लील मोहन सोरेन, कुसाधर हांसदा, सुनाराम सोरेन, कदमा माझी बाबा बिंदे सोरेन, सुरेंद्र टुडू, मनी सोरेन, सुमित्रा बेसरा, शांति माझी, सावित्री हांसदा, बाला हांसदा, करना मुर्मू, सावित्री टुडू समेत संताल जाहेरथान कमेटी के सभी सदस्यों ने सराहनीय योगदान दिया.

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Dashmat Soren

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By Dashmat Soren

Dashmat Soren is a contributor at Prabhat Khabar.

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