बचपन की यादें संजोये है सोनपुर मेला

Updated at : 16 Nov 2016 3:03 AM (IST)
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बचपन की यादें संजोये है सोनपुर मेला

सोनपुर मेला : चौथा दिन. सैलानियों के लिए बना आकर्षण का केंद्र हाजीपुर : बिहार का ऐतिहासिक सोनपुर मेला आज भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. कहने को तो यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, लेकिन यहां आने वाले सैलानियों का आकर्षण नौटंकी कंपनियों की बालाएं भी होती हैं. […]

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सोनपुर मेला : चौथा दिन. सैलानियों के लिए बना आकर्षण का केंद्र

हाजीपुर : बिहार का ऐतिहासिक सोनपुर मेला आज भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. कहने को तो यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, लेकिन यहां आने वाले सैलानियों का आकर्षण नौटंकी कंपनियों की बालाएं भी होती हैं. आने वाले इन बालाओं के मनमोहक नृत्य एवं शोख अदाओं के लोग आज भी मुरीद हैं. वैसे इस मेले में थियेटर का आना कोई नई बात नहीं है. प्राचीन काल से लगने वाले इस मेले में थियेटर का भी अपना इतिहास रहा है. हरिहर क्षेत्र के लोगों का मानना है कि मेले में थियेटर की परंपरा प्रारंभ से है. इसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे.
बचपन को बुलाती वो मिट्टी की सीटी : सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेला जाने के बाद एक बात तो समझ में आती है कि मॉल और डिज्नीलैंड के इस दौर में हमारी परंपरा और संस्कृति जीवित है. यहां जगह-जगह पर हाथ से बने खूबसूरत खिलौने बिक रहे हैं, जिन्हें कभी बचपन में गांव के मेले में देखा जाता था. उन खिलौनों को देख कर बचपन की यादें ताजा हो आती हैं.
आज हर बच्चे की जबान पर स्मार्टफोन, टैपलाॅप, रिमोट कंट्रोल्ड कार और रोबोट का नाम रहता है. मगर इन महंगे खिलौनों से वह भावनात्मक एहसास, जुड़ाव महसूस नहीं होता, जो यहां आकर महसूस होता है. हाथ से बनी मिट्टी की सीटी आज से नहीं, बल्कि कई दशकों से यहां मिल रही है. सबकुछ बदला, लेकिन यह सीटी नहीं बदली है. उम्मीद है कि चाहे कितनी भी आधुनिकता आ जाये, लेकिन इस सीटी का रूप नहीं बदलेगा. चाहे हमारी उम्र कितनी भी क्यों न हो, लेकिन लकड़ी की बनी गाड़ी और उस पर हवाई जहाज के पंखे को हम पास जा कर देखे बिना नहीं रह सकते. मिट्टी से बने सिटी और घिरनी आज भी सैलानियों अपनी ओर आकर्षित कर रही है. डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ते हुए आज सभी को मिट्टी के बने ये खिलौने अपने बचपन के दिनों को याद दिलाते हैं.
अधूरा पड़ा है प्रदर्शनियों का काम : सोनपुर मेला को सजने और संवारने में अभी और 10 दिनों का समय लग सकता है. यहां आये सैलानियों को सरकार के द्वारा कोई मदद नहीं दी जा रही है. इन सैलानियों के मार्गदर्शन के लिए प्रशासन की ओर कोई मदद नहीं मुहैया करायी जा रही है. यहां लगाये जाने वाले कई सरकारी और गैर सरकारी प्रदर्शनियों का काम अभी तक अधूरा है. पशु एवं मत्स्य विभाग, ग्राम श्री मंडप, कौशल विकास, पुल निर्माण निगम, बाल विकास परियोजना, अपराध निरोध, भारत संचार निगम लिमिटेड जैसे महत्वपूर्ण सरकारी प्रदर्शनियों का काम अधूरा पड़ा है. वहीं सुधा, किसानों के लिए प्रदर्शनी, खाद्य पदार्थ, इलेक्ट्रॉनिक, कपड़ों और साजो-सज्जा जैसी निजी प्रदर्शनी का काम भी अभी तक अधूरा पड़ा है.
अपने अस्तित्व को मुहताज कृषि प्रदर्शनी : हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेले में सरकारी, गैर सरकारी प्रदर्शनियों, दुकानों व प्रतिष्ठानों के निर्माण में हजारों की संख्या में मजदूर लगे हैं. यहां कई दिनों से गहमागहमी बनी हुई है. साफ-सफाई और स्टालों के निर्माण का काम उद्घाटन के चार दिनों बाद भी चल रहा है. मेले में हर रोज होने वाली किसान गोष्ठी कृषि विभाग की प्रदर्शनी में करायी जानी है.
लगभग दो एकड़ भूमि पर यह प्रदर्शनी लगाया जाता है. इसमें कृषि विभाग के अलावा राजेंद्र केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के अलावा नारियल विकास बोर्ड, गन्ना विभाग, भूमि संरक्षण योजना, बीज निगम, आत्मा, पौधा संरक्षण विभाग, कृषि वानिकी आदि विभागों की भी प्रदर्शनी लगायी जानी है. इतने तैयारियों के बावजूद यहां आने वाले किसानों को कृषि संबंधित जानकारी नहीं मिलने के कारण मायूस होकर लौटना पड़ता है.
मेले में बिक रहे हाथ से बने खूबसूरत खिलौने
दूरसंचार विभाग द्वारा रेल ग्राम प्रदर्शनी.
प्रशासनिक व्यवस्था से गायब हुए हाथी
एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला होने के बावजूद यहां प्रशासनिक अनदेखी रही. हाथी बाजार मालिक मनोज कुमार सिंह ने बताया कि इस बार सोनपुर मेले में हाथियों की कम संख्या होना विभागीय असुविधा है. प्रशासन ने हाथियों के रख-रखाव में अबतक कोई ध्यान नहीं दिया.
महाबतों को अपने हाथियों के भोजन-पानी की व्यवस्था के लिए जूझना पर रहा है. पुल घाट और नौलक्खा घाट पर हाथीयों का जमावरा लगता है. यहां बिजली और शौचालय जैसी सुबिधाए भी नहीं मुहैया कराई गई है.
मेरे पैरों में बांध घुंघरू, फिर मेरी चाल देख लो…..
मेले में घोड़े के खरीदार कम नहीं हैं. घोड़े की सवारी ग्रामीण बिहार में शान मानी जाती है. इसके खरीदारों में शौकिया लोगों के अलावा कई जमींदार, सरपंच, मुखिया और विधायक भी है. इस बार घोड़े के सौदागर राम बाबू सिंह ने बताया कि इस वर्ष मेले में घोड़ों के बिक्री में नोटों के गहमागहमी के कारण कमी की उम्मीद है. घोड़ों के पैरों में घुंघरू बंधने के बाद इनके चाल की रौनकता बढ़ जाती है. घोड़ों की सवारी कहीं आने-जाने में किफायती होती है और इसके पालने-पोसने में बहुत झंझट नहीं है.
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