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मिथिला की खड़ाऊं परंपरा को जीवंत करने निकली ऐतिहासिक चरण पादुका यात्रा, प्रकृति से जुड़ने का दिया संदेश

Updated at : 18 Jan 2026 6:26 PM (IST)
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मिथिला की खड़ाऊं परंपरा को जीवंत करने निकली ऐतिहासिक चरण पादुका यात्रा, प्रकृति से जुड़ने का दिया संदेश

मिथिला की प्राचीन खड़ाऊं (चरण पादुका) परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड स्थित साधना स्थल खजुरी से नरक निवारण चतुर्दशी के अवसर पर भव्य चरण पादुका यात्रा का आयोजन किया गया.

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सुपौल. मिथिला की प्राचीन खड़ाऊं (चरण पादुका) परंपरा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड स्थित साधना स्थल खजुरी से नरक निवारण चतुर्दशी के अवसर पर भव्य चरण पादुका यात्रा का आयोजन किया गया. हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी यात्रा की शुरुआत प्रातः 5:15 बजे साधना स्थल खजुरी से हुई. यात्रा खजुरी से निकलकर चैनपुर, पररी, चमेली टोला, बनगांव, वासुदेवा, निरहुआ, सीहोर, बीर, पंचगछिया, तुनियाही, पुरुषोत्तमपुर होते हुए दिन के करीब 3:00 बजे बैकुंठ धाम परसरमा पहुंची. वहां विधिवत पूजा-अर्चना के पश्चात पुजारी दिनेश ओझा को खड़ाऊं समर्पित की गयी. खड़ाऊं को मिथिला क्षेत्र में ‘खराम’ कहा जाता है, जिसे समय के साथ आम जनजीवन से लगभग भुला दिया गया है. आयोजन से जुड़े साधकों का कहना है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनि, योगी व गृहस्थ जीवनपर्यंत खड़ाऊं धारण करते थे. इससे वह निरोग रहते थे. आज प्लास्टिक के जूते-चप्पलों के बढ़ते उपयोग से अनेक प्रकार की बीमारियां शरीर को घेर रही है. हृदय रोग व रक्तचाप को नियंत्रित करता है खड़ाऊं साधकों के अनुसार, पृथ्वी में चुंबकीय गुण होते हैं, जो शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखते हैं. जबकि खड़ाऊं में कुचालक गुण पाया जाता है. इससे शरीर की ऊर्जा संरक्षित रहती है. रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है. अस्थमा, हृदय रोग व रक्तचाप जैसी समस्याओं को नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है. साथ ही यह पांचों ज्ञानेंद्रियों को जागरूक करने में भी सहायक मानी जाती है. यात्रा के माध्यम से लोगों को यह संदेश दिया गया कि आओ, प्रकृति की ओर लौटें. कृत्रिम वस्तुएं स्वास्थ्य के लिए घातक है. नियमित रूप से खड़ाऊं धारण करें. समाज में जागरूकता फैलाएं. परंपरा के अनुसार, पहले एक वर्ष तक 24 एकादशी पर यह यात्रा निकाली गयी, बाद में पूरे वर्ष पूर्णिमा को चरण पादुका यात्रा होने लगी, जिसकी शुरुआत नरक निवारण चतुर्दशी से हुई. यह परंपरा आज भी जारी है. इस आयोजन को सफल बनाने में डॉ उदय मिश्र, जयभद्र, सुभद्र, सत्यम, प्रियम, श्रेया, नारायण झा, निशिकांत राय, चंद्र किशोर राय, प्रकाश राय, रितेश व अभिजीत सहित कई साधक और श्रद्धालु शामिल रहे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

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