बिहार में एससी-एसटी पर अत्याचार के मामले में सुनवाई की रफ्तार धीमी, लंबित मामलों में मोतिहारी अव्वल

इस साल जनवरी से लेकर जुलाई तक यानी प्रथम सात महीने में इस एक्ट के तहत 3296 मामले दर्ज किये गये, लेकिन 1056 का ही निबटारा हो सका. इनमें से 72 कांडों में 229 अभियुक्तों को सजा दिलायी गयी है, जबकि 694 कांडों में 2260 अभियुक्तों को रिहा कर दिया गया.
पटना. बिहार में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) एक्ट के तहत दर्ज लगभग 46.6 हजार मामले लंबित हैं. इस साल जनवरी से लेकर जुलाई तक यानी प्रथम सात महीने में इस एक्ट के तहत 3296 मामले दर्ज किये गये, लेकिन 1056 का ही निबटारा हो सका. इनमें से 72 कांडों में 229 अभियुक्तों को सजा दिलायी गयी है, जबकि 694 कांडों में 2260 अभियुक्तों को रिहा कर दिया गया. यह आंकड़े अभियोजन निदेशक की अध्यक्षता में हुई बैठक में निकल कर सामने आये.
समीक्षा बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक छह जिलों में एक्ट के तहत दर्ज कांडों की लंबित संख्या दो हजार से अधिक है. सबसे अधिक 3296 कांड मोतिहारी जिले में लंबित हैं. इसके साथ ही गया में 2970, बेतिया में 2540, समस्तीपुर में 2386, रोहतास में 2196 और भागलपुर में 2012 मामले लंबित हैं. वहीं, 500 से कम लंबित कांड वाले जिलों में शिवहर (130), सीतामढ़ी (454), सहरसा (191), पूर्णिया (414), लखीसराय (461), किशनगंज (324) और अरवल (446) शामिल है. अधिकारियों ने बताया कि सभी 38 जिलों से 829 मामलों को स्पीडी ट्रायल के लिए चिह्नित किया गया है.
बैठक में किशनगंज के एपीपी ने बताया कि सिर्फ संबंधित डॉक्टर और आइओ के स्थानांतरण हो जाने की वजह से उनके जिले में 19 कांड लंबित हैं. इस पर मामले की जानकारी किशनगंज एसपी और सीआइडी की अभियोजन शाखा को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया. एएसपी (कमजोर वर्ग) मदन कुमार आनंद ने कहा कि साक्ष्य हेतु लंबित कांडों में सरकारी गवाहों की सूची शाखा को उपलब्ध करायी जाये ताकि सरकारी गवाहों की उपस्थिति के अभाव में वाद लंबित न रहे.
बैठक में अधिकारियों ने बताया कि 14 जिलों में सजा की संख्या शून्य है. इनमें अरवल, बेगूसराय, भभुआ, बक्सर, जहानाबाद, लखीसराय, मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, नवादा, नालंदा, पूर्णिया, रोहतास, शिवहर और सुपौल शामिल हैं. इन जिलों के विशेष लोक अभियोजकों को कंटेस्टेड कांडों में ट्रायल कराने का निर्देश दिया गया है ताकि दोषसिद्धि दर में वृद्धि हो सके.
उन्होंने कहा कि हत्या के मामलों में आइओ के द्वारा आरोप पत्र समर्पित करने के तुरंत बाद न्यायालय से आरोप पत्र गठन का अनुरोध किया जाये. साथ ही आरोप गठन के बाद तत्काल इसकी सूचना जिला कल्याण पदाधिकारी को दें ताकि पीड़ित या उनके आश्रितों को निर्धारित मुआवजा या नौकरी दिलाने की कार्रवाई की जा सके.
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By Prabhat Khabar News Desk
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