धानुक जाति के लोगों की जिंदगी बदहाल

Updated at : 30 Nov 2015 6:28 PM (IST)
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धानुक जाति के लोगों की जिंदगी बदहाल

बड़हरिया : सामाजिक संरचना में अहम भूमिका निभानेवाली कुछ जातियां सरकार की तमाम कवायदाें व कोशिशों के बावजूद आज तक विकास की मुख्यधारा में नहीं जुड़ पायी हैं. इन्हीं जातियों में शामिल है-धानुक जाति. इस जाति का पुश्तैनी पेशा सुतली काटना और उससे रस्सी बनाना है. लेकिन बदलते दौर ने धानुक जाति से उनका पैतृक […]

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बड़हरिया : सामाजिक संरचना में अहम भूमिका निभानेवाली कुछ जातियां सरकार की तमाम कवायदाें व कोशिशों के बावजूद आज तक विकास की मुख्यधारा में नहीं जुड़ पायी हैं. इन्हीं जातियों में शामिल है-धानुक जाति. इस जाति का पुश्तैनी पेशा सुतली काटना और उससे रस्सी बनाना है. लेकिन बदलते दौर ने धानुक जाति से उनका पैतृक पेशा छीन लिया है.

दरअसल खेती के कार्यो में बैल की जगह ट्रैक्टर ने ले ली व कृषि कार्यों के लिए रस्सी, पगहा, गलजोरी, बरही आदि की जरूरत खत्म हो गयी. इतना ही नहीं पटसन की रस्सी की जगह प्लाॅस्टिक की रस्सी आ गयी. इस प्रकार समाज में बड़ी भूमिका निभानेवाली धानुक जाति हाशिये पर चली गयी.

प्रखंड की चौकी हसन पंचायत के धानुक टोला 100 घर व रसूलपुर पंचायत के रसूलपुर गांव में करीब 40 घर धानुक जाति के लोग रहते हैं.

पलानी के घर व नंग-धड़ंग बच्चों को देख कर इनकी बस्ती का अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है. रसुलपुर धानुक बस्ती के अधिकतर धानुक लोगों को आज तक पक्का मकान नसीब नहीं हो पाया है. यूं कहें कि यह जाति सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक व आर्थिक दृष्टि से आज भी पीछे है. चौकी हसन के धानुक टोला में 100 घर से ज्यादा धानुक जाति के घर हैं.

लेकिन आज तक इन्हें पंचायत प्रतिनिधि तक बनने का अवसर नहीं मिल पाया है.एक जमाने में गांव के बड़े किसान इनके दरवाजे पर रस्सी, पगहा, गलजोरी बरही आदि के लिए चक्कर लगाते थे, लेकिन आज इनका पुश्तैनी पेशा खत्म होने के साथ इनकी रोजी-रोटी भी खत्म हो चुकी है. इसका असर यह है कि इसके लोग बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं.

रसुलपुर के हीरालाल महतो बताते हैं कि इनकी जिंदगी व रोजी-रोटी किसानों की खेतीबाड़ी से जुटी हुई रही है. लेकिन कृषि कार्य के स्वरूप बदलने के साथ ही धीरे-धीरे इनकी रोजी-रोटी छिनती चली गयी. हीरालाल बताते हैं कि पहले किसान बड़े पैमाने पर पटसन व सनई उगाते थे, जिससे धानुक जाति को आसानी से पटसन व सनई के रेशे मुहैया हो जाते थे.

इसी रेशे से सुतली बना कर धानुक जाति के लोग रस्सी, पगहा, गलजोरी, बरही आदि बनाते थे, जो पशुओं को बांधने व कृषि कार्यों में काम आते थे. लेकिन किसानों ने मवेशी पालना कम कर दिया और बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली. विदित हो कि इनके उत्पाद रस्सी, पगहा, गलजोरी, बरही, बरहा आदि से प्रखंड के सलारगंज, कैलगढ़, माधोपुर आदि बाजार रौनक थे.

सलारगंज बाजार में तो सुतली व रस्सी लेने सीवान व छपरा के व्यापारी आया करते हैं, लेकिन बदली व्यवस्था ने धानुक जाति की अहमियत घटने के साथ इनसे रोजी-रोटी भी छीन ली. धानुक टोला के शिवनाथ महतो, योगेंद्र महतो, जगदीश महतो आदि को रोजी-रोटी छिनने का आज भी मलाल है.

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