निर्दोष को जेल भेजने में पुलिस अधिकारी फंसे

Updated at :17 May 2016 4:25 AM
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निर्दोष को जेल भेजने में पुलिस अधिकारी फंसे

सीतामढ़ी : बच्चों को मजदूरी कराने के लिए बाहर ले जाने के आरोप में जेल भेजे गये दो लोगों की शिकायत को राज्य मानवाधिकार आयोग ने काफी गंभीरता से लिया है. आयोग की अब तक की पड़ताल में यह सामने आया है कि दोनों निर्दोष थे और अकारण उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया […]

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सीतामढ़ी : बच्चों को मजदूरी कराने के लिए बाहर ले जाने के आरोप में जेल भेजे गये दो लोगों की शिकायत को राज्य मानवाधिकार आयोग ने काफी गंभीरता से लिया है. आयोग की अब तक की पड़ताल में यह सामने आया है कि दोनों निर्दोष थे और अकारण उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

दोनों को चार माह तक जेल में रहना पड़ा था. आयोग के कड़े रूख के बाद पुलिस की ओर से मामले को वापस लेने के लिए अंतिम प्रतिवेदन समर्पित करना पड़ा है. आयोग ने इस मामले से जुड़े अवर निरीक्षक द्वय शकील अहमद, कृष्ण मोहन यादव व तत्कालीन डीएसपी को आयोग कार्यालय में तलब किया है. तीनों पुलिस पदाधिकारियों को सदेह उपस्थित होकर स्पष्टीकरण सौंपने का निर्देश दिया गया है. उक्त मामले की जानकारी विधान पार्षद देवेश चंद्र ठाकुर ने दी है.

विभागीय कार्रवाई का प्रस्ताव

जिला पुलिस से प्राप्त प्रतिवेदन की समीक्षा के बाद आयोग ने पाया है कि शमशाद व इरशाद को जेल भेज कर प्रताड़ित किया गया जो मानवाधिकार का हनन है. आयोग ने दोनों प्रताड़ित व्यक्तियों को इनके वेतन से क्षतिपूर्ति देने एवं विभागीय कार्रवाई का प्रस्ताव दिया है. आयोग के उक्त निर्णय पर विधान पार्षद श्री ठाकुर ने संतोष जताया है और कहा है कि उक्त कार्रवाई से अब पुलिस लोगों को गलत ढंग से फंसा कर जेल भेजने से परहेज करेगी.

क्या है पूरा मामला

बताया गया है कि बात अगस्त 2014 की है. अदिथि नामक संस्था की एक महिला कर्मी की सूचना पर रून्नीसैदपुर पुलिस ने परिहार प्रखंड के कन्हवा गांव के मो शमशाद व मो इरशाद को 16 बच्चों के साथ पकड़ा था. बच्चों को मजदूरी कराने के लिए बाहर ले जाने के आरोप में दोनों पकड़े गये थे. एक बस से बच्चे व उक्त दोनों हिरासत में लिये गये थे. बच्चों द्वारा यह बार-बार कहा गया कि वे पुना मदरसा में नामांकन कराने के लिए जा रहे हैं. यही बात शमशाद व इरशाद ने भी पुलिस से कही थी. बावजूद पुलिस द्वारा दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था. अनुसंधान में सामने आया कि बच्चों को नामांकन कराने के लिए ही बाहर ले जाया जा रहा था. तब पुलिस ने मामला वापस लेने के लिए अंतिम प्रतिवेदन समर्पित किया और जेल में चार माह रहने के बाद शमशाद व इरशाद बाहर आया.

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