गले की फांस बन गया एमडीएम

Updated at :08 May 2016 3:41 AM
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गले की फांस बन गया एमडीएम

एमडीएम योजना. मानसिक तनाव में बीत रहा शिक्षकों का एक-एक पल निजी विद्यालयों की अपेक्षा सरकारी स्कूल में शिक्षकों का वेतन अधिक है. बच्चों के बौद्धिक, मानसिक व शारीरिक विकास के लिए सरकार की ओर से फंड भी आवंटित किये जाते है, बावजूद गरीब से गरीब लोग अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने का […]

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एमडीएम योजना. मानसिक तनाव में बीत रहा शिक्षकों का एक-एक पल

निजी विद्यालयों की अपेक्षा सरकारी स्कूल में शिक्षकों का वेतन अधिक है. बच्चों के बौद्धिक, मानसिक व शारीरिक विकास के लिए सरकार की ओर से फंड भी आवंटित किये जाते है, बावजूद गरीब से गरीब लोग अपने बच्चों को निजी स्कूल में पढ़ाने का सपना देखते है.
प्रभात खबर ने इसको लेकर सरकारी स्कूल के शिक्षकों से बातचीत कर कारण जानने का प्रयास किया, तो यह सामने आया कि मिड-डे-मिल के संचालन के समेत कई तरह के ऐसे कार्य है, जिसमें सरकारी शिक्षक गेहूं के घुन की तरह पिसते रहते है. ऐसे में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना संभव नहीं है.
सीतामढ़ी : जिला मुख्यालय से डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित है राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय सीमरा. जहां 8 वीं कक्षा तक के लिए 540 बच्चे नामांकित है. बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए प्रधानाध्यापक को लेकर 14 शिक्षक व शिक्षिका पदस्थापित है.
बच्चों को शिक्षित करने के लिए सरकार की ओर से मिल रही सुविधाओं को लेकर अधिकांश शिक्षक व शिक्षिकाएं संतोष प्रकट करती है, किंतु बच्चों के पठन-पाठन को लेकर असंतोष प्रकट करती है. कहती है कि मध्याह्न भोजन व पोशाक राशि समेत अन्य सरकारी कार्यों में उलझे रहने के कारण वे लोग चाह कर भी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे पा रहे है.
भोजन करने के बाद गायब हो जाते हैं बच्चे: कहा कि, यही हाल मध्याह्न भोजन का है. कई बच्चे भोजन करने के पहले आते है और फिर चले जाते है. स्कूल का गेट अगर बंद कर दिया जाता है, तो चहारदीवारी कम ऊंचाई रहने के कारण छलांग लगा कर चले जाते है. अगर किसी बच्चे के साथ सख्ती बरती जाती है, तो किसी-किसी के अभिभावक स्कूल में आकर मारपीट पर उतारू हो जाते है.
अब सवाल उठता है कि हाजिरी के अनुसार मध्याह्न भोजन बनाया जाता है,
तो बच्चों के हंगामा व दुर्व्यवहार का भय, और अगर नियम का उल्लंघन कर मध्याह्न भोजन के वक्त आने वाले बच्चों के लिए हाजिरी बनायी जाये, तो औचक निरीक्षण होने पर विभागीय कार्रवाई का भय. इसके अलावा लगातार अनुपस्थित रहने वालों बच्चों को तलाश कर स्कूल लाने की जवाबदेही भी शिक्षकों को दे दी गयी है.
क्या यह उचित है? क्या बच्चों को समय पर स्कूल भेजना अभिभावकों का फर्ज नहीं बनता है? ऐसी स्थिति में शिक्षक हर वक्त मानसिक तनाव में रहते है. अब सवाल उठता है कि क्या मानसिक तनाव में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सकती है. कभी नहीं.
परिवार के लिए नहीं निकलता समय: बताती है कि उक्त समस्याओं के कारण स्कूल से लौटने के बाद परिवार के सदस्यों के साथ खुशनुमा माहौल में नहीं रह पाती है. मानसिक तनाव के कारण वे पारिवारिक सदस्यों का जवाब नम्रतापूर्वक नहीं दे पाती है. इस कारण घर में भी तनाव का माहौल बना रहता है. स्कूल से आने के बाद पोशाक राशि व मध्याह्न भोजन समेत अन्य कागजी काम करने के लिए वे अपने रिश्तेदारों या मित्रों के किसी घरेलू कार्यक्रम में शरीक नहीं हो पाती है. इस कारण रिश्तेदारों व मित्रों से भी दूरी बनती जा रही है.
बेहतर होता कि पोशाक राशि व मध्याह्न भोजन की राशि बच्चों के खाता में डालने का नियम बना दिया जाता है. उक्त दोनों बोझ हटने से सरकारी स्कूल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का शत-प्रतिशत माहौल बनने की पूरी गुंजाइश थी.
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