किसानों की जीवन शैली सुधरे: सिद्धीकी

Updated at : 23 Oct 2016 12:29 AM (IST)
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किसानों की जीवन शैली सुधरे: सिद्धीकी

राजगीर में राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिये बिहार-झारखंड भूगोलविद 75 फीसदी किसान के पास आधा एकड़ से भी कम जमीन राजगीर : अंतरराष्ट्रीय कन्वेंसन सेंटर में शनिवार को कृषि वानिकीकरण एवं विकास विषय पर बिहार एवं झारखंड के भुगोलविद विशेषज्ञों के एसोसिएशन एजीवीजे का दो दिवसीय 18 वां राष्ट्रीय सेमिनार सह वार्षिक अधिवेशन का आयोजन […]

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राजगीर में राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लिये बिहार-झारखंड भूगोलविद

75 फीसदी किसान के पास आधा एकड़ से भी कम जमीन
राजगीर : अंतरराष्ट्रीय कन्वेंसन सेंटर में शनिवार को कृषि वानिकीकरण एवं विकास विषय पर बिहार एवं झारखंड के भुगोलविद विशेषज्ञों के एसोसिएशन एजीवीजे का दो दिवसीय 18 वां राष्ट्रीय सेमिनार सह वार्षिक अधिवेशन का आयोजन किया गया. जिसका उद्घाटन राज्य के वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्धीकी एसोसिएशन के अध्यक्ष सह मगध विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ प्रो इस्तेयाक ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया. इस अवसर पर वित्तमंत्री अब्दूल बारी सिद्धीकी ने कहा इस तरह का सेमिनार किसानों के जीवन शैली में सुधार लाने का एक बेहतर प्रयास हो सकता है.
उन्होंने कहा कि आज किसानों के जीवन शैली में गिरावट देखा जा रहा है. खेतीहर मजदूरों और गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वालों की संख्या बिहार सहित देश के अन्य राज्यों में भी बढ़ रहा है. यह एक गंभीर विषय है. आज लोग कृषि कि तुलना उद्योग से करने लगे हैं परंतु कृषि में उद्योग से कहीं ज्यादा मेहनत और रिक्स है. किसानों को बाढ़ और सुखाड़ तो झेलने ही पड़ते है, उन्हें कृषि उपकरण से लेकर खाद और बीज, कीटनाशक, खुदरा पर पर खरीदना पड़ता है.
वहीं उन्हें अपने फसल को थोक भाव से बेचना पड़ता है. किसानों के पास कोई विकल्प नहीं है. इसका एक वजह किसानों को बाजार उपलब्ध ना होना और बिहार में फूड प्रोसेसिंग प्लांट की कमी है. उन्होंने कहा कि आज बिहार में 75 प्रतिशत किसान के पास आधा एकड़ से कम भूमि रह गयी है. उन्होंने भूगोलविदों कि ओर इशारा करते हुए कहा कि आप सभी इस सेमिनार से ऐसा कुछ निकालें, जो किसानों के हित में हो. उन्होंने कहा कि बिहार के किसान आज भी पारंपरिक खेती कर रहे हैं.
जिसमें बदलाव लाने की जरूरत है. इस अवसर पर पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कूलपति प्रो. डा. एलएन राम ने कहा कि किसानों के दो प्रमुख समस्या ,जो आज से सौ दो साल पहले थी. वह आज भी उसी तरह बरकारार है. इसमें बाढ़ और सुखाड़ शामिल है. आहर और पइन खेती के दो प्रमुख आयाम है, आज ये दोनों खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है. किसानों ने अपने फसलों को अपने बच्चों कि तरह प्यार करते हैं और जब उनका फसल किसी वजह से नष्ट होता है तो उन्हें वहीं दुख पहुंचता है, जो किसी परिवार के खोने का होता है.
नालंदा ओपेन विश्वविद्यालय के प्रो. आरबीपी सिंह ने कहा कि हमारे देश के सांस्कृति का आधार कृषि है. भारतीय किसान मौसुन के साथ जुआ खेलते हैं. जेएसटी किसानों के लिए वरदान साबित होगा. प्रो. टूनटून झा ने कहा कि किसान तीन प्रकार के है.
पहला तो वैसे किसान जिनके पास खेती है परंतु उनका खेती दूसरा करता है और दूसरा वैसे किसान जिनके पास खेती नहंी है, लेकिन वे दूसरे का खेती करते है. तीसरा वैसे किसान जिनके पास अपना खेती है और वे खूद खेती करते और कराते हैं. उन्होंने कहा कि आज बहुत से फसले लुप्त हो गई है, जो काफी पोषक थी.
वहीं कार्यक्रम को एसोसिएशन के जेनरल सेकेट्री प्रो. डा. अताउलाह, किसान कॉलेज के प्राचार्य डा. दिलीप कुमार, पटना विश्वविद्यालय भुगोल विभाग के प्रो. एण्ड हेड डा. जीपी झा सहित अन्य ने संबोधित किया. कार्यक्रम का आयोजन किसान कॉलेज सोहसराय बिहारशरीफ के भुगोल विभाग द्वारा किया गया. मंच का संचालन डा. अनूप कुमार सिंह ने किया. इस मौके पर किसान कॉलेज के प्रो. डा. संजय कुमार सहित बिहार झारखंड के सैकड़ों भुगोलविद प्रतिनिधि मौजूद थे.
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