बिहार के इस चीनी मिल की अजीब किस्मत, बंद होने पर हंगामा, अब शुरू करने पर विरोध
मढ़ौरा चीनी मिल। AI Generated
Marhaura Sugar Mill: एक समय सारण की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही मढ़ौरा चीनी मिल करीब तीन दशक से बंद है. अब इसे नई जगह ले जाने की चर्चा ने स्थानीय लोगों को नाराज कर दिया है, जो मिल को यहीं पुनर्जीवित करने की मांग कर रहे हैं.
Marhaura Sugar Mill: सारण की मढ़ौरा चीनी मिल करीब तीन दशक से बंद है. कभी इस इलाके की अर्थव्यवस्था और रोजगार का बड़ा आधार रही यह मिल अब एक बार फिर चर्चा में है. फर्क इतना है कि पहले इसे बंद होने से बचाने और दोबारा शुरू कराने की मांग होती थी, अब इसे मढ़ौरा से बाहर ले जाकर नई जगह मिल स्थापित करने की चर्चा ने स्थानीय लोगों को नाराज कर दिया है. रविवार को मिल परिसर में हुई बैठक में लोगों ने साफ कहा कि मिल शुरू करनी है तो मढ़ौरा में ही की जाए.
अभी का हंगामा क्या है
मढ़ौरा की बंद चीनी मिल को लेकर एक बार फिर स्थानीय स्तर पर हलचल तेज हो गयी है. रविवार को बंद मिल परिसर में युवाओं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक लोगों की बैठक हुई. बैठक में तरैया के रामकोला फार्म हाउस में चीनी मिल स्थापित करने की कथित सरकारी पहल को लेकर आपत्ति जतायी गयी.

स्थानीय लोगों का तर्क है कि मढ़ौरा में पहले से चीनी मिल का बड़ा परिसर और उससे जुड़ा आधारभूत ढांचा मौजूद है. ऐसे में नये स्थान पर मिल स्थापित करने की बजाय इसी परिसर का इस्तेमाल कर पुरानी औद्योगिक इकाई को फिर से खड़ा किया जाना चाहिए.
बैठक में मढ़ौरा में ही मिल को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया. लोगों ने कहा कि यह केवल रोजगार से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि मढ़ौरा की औद्योगिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है.
गन्ना उद्योग विभाग की ओर से नई चीनी मिल के लिए तरैया अंचल के रामकोला फार्म हाउस की जमीन को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात सामने आने के बाद यह विवाद तेज हुआ है. विभाग की 16 जुलाई 2026 की कार्यवाही से संबंधित जानकारी भी सामने आयी है. हालांकि, स्थानीय स्तर पर इसे मढ़ौरा की पुरानी मिल के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है.

कौन और क्यों कर रहे विरोध
मढ़ौरा में हुई बैठक में स्थानीय युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक नेताओं ने हिस्सा लिया. बैठक का संचालन राजद व्यवसायी प्रकोष्ठ के नेता विष्णु गुप्ता ने किया. कांग्रेस नेता लालबाबू गिरी, नीरज कुमार सिंह, आदित्य कुमार, अतुल प्रताप सिंह, मनोज गुप्ता, युवराज भास्कर, उप मुखिया अजीत कुमार सिंह, बीडीसी मोहन साह समेत कई लोग मौजूद रहे.
विरोध करने वालों की मुख्य दलील यह है कि मढ़ौरा में पहले से मौजूद औद्योगिक परिसर को छोड़कर किसी दूसरे इलाके में नई चीनी मिल लगाना स्थानीय हित में नहीं होगा. उनका कहना है कि मिल दोबारा चलने पर आसपास के किसानों के लिए गन्ना एक बार फिर नकदी फसल बन सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
लोगों ने सरकार से मांग की है कि मिल के भविष्य को लेकर कोई भी फैसला लेने से पहले मढ़ौरा के लोगों की राय और यहां उपलब्ध जमीन व पुराने ढांचे को ध्यान में रखा जाए.
बैठक में यह भी चेतावनी दी गयी कि यदि जल्द कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो स्थानीय लोग चरणबद्ध आंदोलन शुरू करेंगे.
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ऐसा पहली बार नहीं है जब मढ़ौरा मिल पर राजनीति गरमायी हो
मढ़ौरा चीनी मिल को दोबारा शुरू करने की मांग कई वर्षों से राजनीतिक मुद्दा रही है. चुनावी दौर में मिल को लेकर वादे और आश्वासन भी सामने आते रहे हैं.
नवंबर 2025 में बिहार सरकार ने बंद चीनी मिलों को फिर से शुरू करने और राज्य में चीनी उद्योग के विस्तार की दिशा में कदम उठाने की बात कही थी. उस समय मढ़ौरा समेत बंद मिलों के पुनर्जीवन की उम्मीद फिर जगी थी.
यही वजह है कि अब तरैया में नयी मिल की चर्चा ने स्थानीय स्तर पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब मढ़ौरा की पुरानी मिल को फिर से शुरू करने की उम्मीद बनी थी, तो नयी जगह पर मिल लगाने की जरूरत क्यों महसूस हुई.
चीनी मिल का पूरा इतिहास जानिए
मढ़ौरा की औद्योगिक कहानी केवल एक चीनी मिल की कहानी नहीं है. कभी यहां चीनी मिल के साथ मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी औद्योगिक इकाइयां भी थीं. इन संस्थानों ने मढ़ौरा को सारण के प्रमुख औद्योगिक इलाकों में शामिल किया था.
मढ़ौरा की चीनी मिल लंबे समय तक आसपास के किसानों और मजदूरों के लिए रोजगार और आय का प्रमुख माध्यम रही. मिल के आसपास गन्ने की खेती का बड़ा नेटवर्क था. इसलिए मिल की गतिविधियों का असर केवल फैक्ट्री परिसर तक सीमित नहीं था, बल्कि आसपास के गांवों की अर्थव्यवस्था तक पहुंचता था.
कब शुरू हुई थी मढ़ौरा चीनी मिल
मढ़ौरा चीनी मिल की स्थापना 1904 में कानपुर शुगर वर्क्स द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है. इसे बिहार की शुरुआती और महत्वपूर्ण चीनी मिलों में गिना जाता है.
बाद के वर्षों में मिल का प्रबंधन ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन के हाथों में भी रहा. आजादी के बाद भी लंबे समय तक यह इकाई उत्पादन और रोजगार के लिहाज से महत्वपूर्ण बनी रही.
मिल का इतिहास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मढ़ौरा का औद्योगिक विकास एक ही कारखाने के इर्द-गिर्द नहीं हुआ था. यहां अलग-अलग उद्योगों के कारण रोजगार और व्यापार का पूरा तंत्र विकसित हुआ था.

क्या-क्या बनता था
मढ़ौरा चीनी मिल का मुख्य काम गन्ने से चीनी का उत्पादन था. इसके लिए आसपास के बड़े इलाके में गन्ने की खेती होती थी और किसान अपनी उपज मिल तक पहुंचाते थे.
चीनी के साथ इस औद्योगिक व्यवस्था का असर स्थानीय परिवहन, मजदूरी, छोटे कारोबार और कृषि गतिविधियों पर भी पड़ता था. मिल चलने के दौर में गन्ना किसानों के लिए यह स्थानीय बाजार का महत्वपूर्ण केंद्र था.
मढ़ौरा में चीनी उद्योग के साथ मॉर्टन की चॉकलेट और अन्य औद्योगिक इकाइयों की मौजूदगी ने कस्बे की अलग पहचान बना दी थी. यही वजह है कि पुराने दौर की मढ़ौरा की चर्चा आज भी उसके औद्योगिक अतीत के संदर्भ में होती है.
क्यों फेमस थी मढ़ौरा की चीनी मिल
मढ़ौरा को कभी सिर्फ एक कस्बे के तौर पर नहीं देखा जाता था. इसकी पहचान औद्योगिक गतिविधियों से जुड़ी थी. चीनी मिल, मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी इकाइयों ने यहां रोजगार का बड़ा आधार तैयार किया था.
चीनी मिल से जुड़े लोगों के अनुसार, आसपास के कई प्रखंडों में गन्ने की खेती का सीधा संबंध मिल से था. मिल बंद होने के बाद इस कृषि व्यवस्था पर भी असर पड़ा. 2018 की एक रिपोर्ट में भी मिल बंद होने के बाद आसपास के कई प्रखंडों में गन्ने की खेती प्रभावित होने और हजारों किसान परिवारों पर असर पड़ने का उल्लेख किया गया था.
यानी मिल की चिमनी से निकलने वाला धुआं सिर्फ उत्पादन का संकेत नहीं था. वह आसपास के गांवों की आर्थिक गतिविधियों का भी संकेत माना जाता था.
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कैसे बंद हुई मढ़ौरा चीनी मिल
मिल की हालत 1990 के दशक में बिगड़ती गयी और आखिरकार 1998 के आसपास इसका उत्पादन पूरी तरह बंद हो गया. उपलब्ध रिपोर्टों में 1995 के बाद मिल की स्थिति खराब होने और 1998 में इसके बंद होने का उल्लेख मिलता है.
इसके बाद मिल को दोबारा शुरू कराने की कोशिशें भी हुईं. 1998-99 में इसे लखनऊ की गंगोत्री इंटरप्राइजेज के हाथों सौंपे जाने की बात सामने आती है. लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हुआ. वर्ष 2000 में बिहार राज्य वित्त निगम ने इसे बीमार इकाई घोषित कर अपने कब्जे में ले लिया.
इसके बाद जुलाई 2005 में उद्योगपति जवाहर जायसवाल ने मिल को खरीदा. 2007 के आसपास इसे फिर से शुरू करने की कोशिश भी हुई. किसानों से गन्ने की खेती करने की अपील की गयी और बड़े स्तर पर तैयारी की गयी, लेकिन मिल दोबारा उत्पादन शुरू नहीं कर सकी.
यही वह दौर था जब मिल के फिर से शुरू होने की उम्मीद लगाए किसानों को निराशा हाथ लगी. रिपोर्टों के अनुसार, किसानों ने गन्ने की खेती की, लेकिन मिल नहीं चली और उन्हें अपनी फसल को लेकर नुकसान उठाना पड़ा.

बंद होने के बाद क्या हुआ
मिल के बंद होने का असर केवल फैक्ट्री की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा. इसके साथ जुड़े रोजगार, गन्ने की खेती और स्थानीय कारोबार पर भी असर पड़ा.
समय बीतने के साथ मिल परिसर की मशीनरी और इमारतों की स्थिति खराब होती गयी. कभी जहां औद्योगिक गतिविधियां होती थीं, वहां धीरे-धीरे वीरानी छा गयी.
मढ़ौरा की औद्योगिक पहचान को झटका केवल चीनी मिल बंद होने से नहीं लगा. मॉर्टन फैक्ट्री, सारण इंजीनियरिंग और डिस्टिलरी जैसी अन्य औद्योगिक इकाइयों के बंद होने से भी इस क्षेत्र की पुरानी औद्योगिक व्यवस्था कमजोर होती गयी. मढ़ौरा की औद्योगिक विरासत के खत्म होने पर प्रकाशित रिपोर्टों में इन इकाइयों का एक साथ उल्लेख मिलता है.
बंद होने के बाद की राजनीति क्या रही
मढ़ौरा चीनी मिल चुनावी राजनीति में लगातार मुद्दा बनी रही. स्थानीय स्तर पर नेता और सामाजिक संगठन समय-समय पर इसे दोबारा शुरू कराने की मांग उठाते रहे हैं.
2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मढ़ौरा में चुनावी सभा की थी. उस सभा में उन्होंने पुराने औद्योगिक ढांचे, चीनी कारखानों और रोजगार का मुद्दा उठाया था. उन्होंने बिहार में उद्योगों को फिर से खड़ा करने और युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी.
इसके बाद भी मिल शुरू नहीं हो सकी. 2024 में प्रधानमंत्री के सारण दौरे के समय स्थानीय लोगों ने एक बार फिर 2015 में मढ़ौरा में कही गयी बातों को याद किया और मिल के पुनर्जीवन की उम्मीद जतायी थी.
2015 में मढ़ौरा पहुंचे थे पीएम मोदी, क्या कहा था
25 अक्टूबर 2015 को मढ़ौरा में चुनावी सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इलाके के पुराने चीनी उद्योग और रोजगार का जिक्र किया था. उन्होंने कहा था कि कभी यहां के चीनी कारखाने किसानों और युवाओं की आर्थिक स्थिति से जुड़े थे.
पीएम ने बिहार में बिजली, पानी, सड़क, पढ़ाई, कमाई और दवाई को विकास के प्रमुख आधार बताते हुए उद्योगों को दोबारा शुरू करने की जरूरत पर जोर दिया था. मढ़ौरा के संदर्भ में उन्होंने उद्योगों को फिर से शुरू करने के लिए कमेटी बनाने और युवाओं को रोजगार देने की बात कही थी.
उस वक्त स्थानीय लोगों में उम्मीद जगी थी कि मढ़ौरा की बंद औद्योगिक इकाइयों का दौर फिर लौट सकता है. लेकिन वर्षों बाद भी चीनी मिल की चिमनी से उत्पादन का धुआं नहीं उठा.
2007 के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
मिल को दोबारा शुरू करने की सबसे चर्चित कोशिशों में से एक 2007 के आसपास हुई थी. उस समय किसानों को फिर से गन्ने की खेती के लिए तैयार किया गया. रिपोर्टों के अनुसार करीब 5 हजार एकड़ क्षेत्र में गन्ने की खेती भी हुई, लेकिन मिल के नहीं चलने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
इस घटना ने स्थानीय लोगों के बीच मिल के पुनर्जीवन को लेकर भरोसे को भी झटका दिया. इसके बाद भी चुनाव-दर-चुनाव यह मुद्दा सामने आता रहा.

2024 में फिर उठी मिल शुरू कराने की मांग
2024 में सारण में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम से पहले मढ़ौरा में बंद चीनी मिल को लेकर फिर उम्मीद जगी थी. स्थानीय लोगों ने 2015 की चुनावी सभा में उद्योग और मिलों को लेकर कही गयी बातों को याद किया था.
इसी दौरान यह मांग भी उठती रही कि मढ़ौरा की पुरानी औद्योगिक पहचान को सिर्फ इतिहास का हिस्सा न बनने दिया जाए. चीनी मिल के साथ अन्य बंद औद्योगिक इकाइयों को लेकर भी स्थानीय स्तर पर आवाज उठती रही है.
2025 में फिर जगी उम्मीद
नवंबर 2025 में बिहार सरकार ने बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा शुरू करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही. उस समय मढ़ौरा समेत कई बंद मिलों के पुनर्जीवन की उम्मीद बनी. सरकार की ओर से बंद मिलों को फिर से चालू करने की प्रक्रिया के लिए उच्चस्तरीय स्तर पर पहल की खबर भी सामने आयी.
मढ़ौरा के लोगों के लिए यह इसलिए अहम था क्योंकि लंबे समय बाद पहली बार बंद मिल को लेकर सरकारी स्तर पर फिर चर्चा तेज हुई थी.
अब सवाल मढ़ौरा बनाम रामकोला का क्यों
यही पूरा घटनाक्रम अब नये विवाद का कारण बना है. एक तरफ मढ़ौरा के लोग पुरानी मिल को इसी जगह दोबारा शुरू करने की मांग कर रहे हैं. दूसरी तरफ तरैया के रामकोला फार्म हाउस में नयी चीनी मिल के लिए जमीन से जुड़ी प्रक्रिया की चर्चा सामने आयी है.
स्थानीय लोगों को आशंका है कि अगर नई मिल किसी दूसरे स्थान पर स्थापित होती है, तो मढ़ौरा की पुरानी चीनी मिल के पुनर्जीवन की संभावना और कमजोर हो सकती है.
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर रामकोला में जमीन संबंधी प्रक्रिया को मढ़ौरा की पुरानी मिल को स्थानांतरित करने का अंतिम सरकारी फैसला मानना जल्दबाजी होगी. फिलहाल यही मुद्दा स्थानीय विरोध का केंद्र बना हुआ है.

क्यों चाहते हैं लोग कि मिल मढ़ौरा में ही खुले
स्थानीय लोगों की मांग के पीछे तीन बड़े तर्क हैं.
पहला, मढ़ौरा की औद्योगिक पहचान इसी मिल और पुराने उद्योगों से जुड़ी रही है.
दूसरा, यहां पहले से बड़ा औद्योगिक परिसर और उससे जुड़ी जमीन उपलब्ध है, जिसका इस्तेमाल पुनर्जीवन में किया जा सकता है.
तीसरा, मिल शुरू होने पर आसपास के गन्ना किसानों को स्थानीय बाजार मिल सकता है और रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं.
यही वजह है कि रविवार की बैठक में मौजूद लोगों ने नयी जगह पर मिल स्थापित करने की बजाय मढ़ौरा की पुरानी इकाई को फिर से खड़ा करने की मांग की.
अब आगे क्या होगा
फिलहाल मढ़ौरा में स्थानीय स्तर पर विरोध की आवाज तेज हो गयी है. बैठक में आंदोलन की चेतावनी भी दी गयी है. दूसरी तरफ राज्य सरकार की चीनी उद्योग से जुड़ी योजनाओं और नई मिलों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है.
ऐसे में मढ़ौरा के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले दिनों में सरकार पुरानी मिल के पुनर्जीवन को प्राथमिकता देती है या क्षेत्र में नयी जगह पर चीनी उद्योग स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ती है.
करीब तीन दशक से बंद पड़ी मढ़ौरा चीनी मिल की कहानी इसलिए भी अलग है, क्योंकि इसके बंद होने पर भी लोगों ने आवाज उठायी और अब इसे फिर से शुरू करने की कोशिशों के बीच भी लोग सड़क पर उतरने की बात कर रहे हैं. यानी मढ़ौरा की इस मिल के लिए हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि बंद रहे तो सवाल, खुले तो जगह को लेकर विवाद.
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लेखक के बारे में
By विकाश झा
विकाश झा डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में छह वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं. उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन में स्नातक तथा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है. स्पोर्ट्स, हाइपरलोकल और पॉलिटिकल पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं. क्रिकेट, समाज और राजनीति से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष पकड़ है. वे तथ्य आधारित, प्रभावशाली और पाठक-केंद्रित कंटेंट तैयार करने में रुचि रखते हैं.
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