आधुनिकता का असर दिख रहा सोनपुर मेले पर

Published at :02 Dec 2015 6:29 PM (IST)
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आधुनिकता का असर दिख रहा सोनपुर मेले पर

आधुनिकता का असर दिख रहा सोनपुर मेले पर आमजनों की जरूरत की सामग्री व पशुओं की खरीद-बिक्री में भारी कमी संवाददाता, छपरा (सदर)गौरवशाली अतीतवाले एशिया महादेश के सबसे बड़े मेले हरिहर क्षेत्र सोनपुर पर आधुनिकता का सीधा असर दिख रहा है. हालांकि लोगों की इस धार्मिक नगरी में लगनेवाले मेले के प्रति धार्मिक आस्था में […]

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आधुनिकता का असर दिख रहा सोनपुर मेले पर आमजनों की जरूरत की सामग्री व पशुओं की खरीद-बिक्री में भारी कमी संवाददाता, छपरा (सदर)गौरवशाली अतीतवाले एशिया महादेश के सबसे बड़े मेले हरिहर क्षेत्र सोनपुर पर आधुनिकता का सीधा असर दिख रहा है. हालांकि लोगों की इस धार्मिक नगरी में लगनेवाले मेले के प्रति धार्मिक आस्था में कमी नहीं आयी है. परंतु, एक जमाने में आमजनों की जरूरत की सामग्री अन्य बाजारों से सस्ते दर पर उपलब्ध कराने तथा विभिन्न प्रकार के पालतू जानवरों व पक्षियों की खरीद-बिक्री के लिए मशहूर इस मेले में लोगों की उपस्थिति काफी कम हो गयी है. ऐसी स्थिति में पशु क्रूरता अधिनियम के तहत खरीद-बिक्री की बातें काफी कम हो गयी हैं. तभी तो हाथी, घोड़े आदि जानवरों के पालक उन्हें मेले में शौकिया लाते हैं. परंतु, खरीद-बिक्री की रफ्तार नहीं दिखती. मॉल व शो रूम के दौर में मेला व्यवसाय पड़ा फीका एक जमाने में कार्तिक पूर्णिमा को लगनेवाले इस मेले में धार्मिक स्नान के साथ-साथ राज्य या राज्य के बाहर के विभिन्न हिस्सों से आमजन सोनपुर मेले में रोजमर्रे की सामग्रियों यथा ओखली, मूसल, चकला, बाल्टी आदि घरेलू उपयोग के सामानों के अलावा जाड़े के मौसम के लिए कंबल, चादर व अन्य गरम कपड़े खरीदते थे. इसकी वजह यह भी थी की उस वक्त जिले व विभिन्न प्रखंड मुख्यालयों में आधुनिक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स व शो रूम या बड़े प्रतिष्ठान नहीं थे. वहीं पुराने ओखली, मूसल, चकला, बाल्टी के बदले अब दैनिक उपयोग में आनेवाले आकर्षक सामान गांव-गांव में उपलब्ध होने लगे हैं. ऐसी स्थिति में इन सामानों की खरीदारी के लिए अब लोग सोनपुर मेले में आने की जरूरत नहीं समझते हैं. पशुओं की संख्या में 80 फीसदी की कमीग्रामीण क्षेत्रों में 80 फीसदी जानवरों की संख्या घट गयी है. पूर्व में गांव में खेती करनेवाले किसानों के यहां एक जोड़ी बैल, भैंस आदि जानवर पाले जाते थे. परंतु, अब तो ग्रामीण क्षेत्रों में बैलों की बात किसान भूल ही गये हैं. बैलों की जगह ट्रैक्टर आदि ने ले लिया है. ऐसी स्थिति में सोनपुर मेले में बैल, घोड़े आदि नहीं के बराबर पहुंच रहे हैं. ऐसी स्थिति में विविधतावाले इस मेले के आकर्षण में कमी आना स्वाभाविक है.

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