समस्तीपुर के स्कूल में बच्चों ने मिट्टी से बनाई गणेश की आकर्षक और जीवंत प्रतिमाएं
गणेश की प्रतिमा बनाते बच्चें | Prabhat Khabar Network
उच्च माध्यमिक विद्यालय केराई में बच्चों ने कबाड़ और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर मिट्टी से भगवान गणेश की शानदार प्रतिमाएं तैयार की हैं. यह गतिविधि कला को अनुभवात्मक शिक्षा से जोड़ती है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती है.
school art activity: समस्तीपुर जिले के स्कूलों में नवाचार के जरिए बच्चों की प्रतिभाओं को बहुआयामी दिशा दी जा रही है. इसी कड़ी में उच्च माध्यमिक विद्यालय केराई में ललित कला शिक्षिका डॉली कुमारी बच्चों में एक नायाब प्रतिभा पिरोने का काम कर रही हैं. यहां के बच्चे मझे हुए कलाकारों की तरह मिट्टी की जीवंत प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं. विद्यार्थियों ने ललित कला का शानदार प्रदर्शन करते हुए मिट्टी से भगवान गणेश की बेहद आकर्षक प्रतिमा तैयार कर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का परिचय दिया है.
Samastipur News: कबाड़ से जुगाड़ और स्थानीय संसाधनों का बेहतरीन उपयोग
विद्यालय परिसर में आयोजित इस गतिविधि में विद्यार्थियों ने केवल प्रतिमा निर्माण ही नहीं किया, बल्कि कल्पना, कला और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का अनूठा उदाहरण भी प्रस्तुत किया. पूजा-अर्चना के साथ शुरू हुई इस रचनात्मक पहल में विद्यार्थियों ने सबसे पहले लकड़ी का स्टैंड तैयार किया. इसके बाद कार्डबोर्ड और पुराने अखबारों का उपयोग करते हुए प्रतिमा का आधारभूत ढांचा बनाया. गांव के तालाब किनारे से लाई गई मिट्टी को व्यवस्थित ढंग से तैयार कर विद्यार्थियों ने अपने हाथों से गणेश प्रतिमा को आकार दिया और उसके विभिन्न अंगों व बारीक विवरण को उभारकर आकर्षक स्वरूप प्रदान किया.
शिक्षिका डॉली कुमारी के मार्गदर्शन में बच्चों ने सीखी कला की बारीकियां
ललित कला शिक्षिका डॉली कुमारी ने विद्यार्थियों को प्रतिमा निर्माण की विभिन्न प्रक्रियाओं से परिचित कराते हुए अनुपात, संतुलन, संरचना और त्रि-आयामी कला की बारीकियों को समझाया. उनके मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया और कला को केवल कागज तक सीमित न रखकर उसे वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने का अनुभव प्राप्त किया. इस दौरान बच्चों ने आपसी सहयोग, धैर्य, कल्पनाशक्ति, सूक्ष्म निरीक्षण और रचनात्मक सोच का बेहतरीन प्रदर्शन किया.
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती पर्यावरण-अनुकूल गतिविधि
इस गतिविधि की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि प्रतिमा निर्माण में पूरी तरह स्थानीय एवं पुनः उपयोग योग्य (रीसाइक्बुल) सामग्री का इस्तेमाल किया गया. इससे विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के सदुपयोग का महत्वपूर्ण संदेश भी मिला. विद्यालय में किया गया यह नवाचारी प्रयास ललित कला को अनुभवात्मक शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक मिल का पत्थर साबित हो रहा है. इस रचनात्मक कार्य में रितेश कुमार, सुजीत कुमार, विक्रम कुमार, अभिकर्ष कुमार, निशांत कुमार, रजनीश कुमार, कृष्णा कुमार महतो, मणिभूषण कुमार, तवशी कुमारी और प्रीति कुमारी ने सक्रिय रूप से भाग लिया.
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