समस्तीपुर: जूट मिल में एक बार फिर बजा सायरन, लेकिन मजदूरों के चेहरों पर अब भी मायूसी

Published by : SUMIT KUMAR Updated At : 10 Jun 2026 7:29 PM

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जूट मिल में एक बार फिर बजा सायरन

Samastipur News: समस्तीपुर की ऐतिहासिक रामेश्वर जूट मिल में सात महीने बाद सायरन तो बजा, लेकिन कच्चे माल की कमी और 2010 से ईपीएफ-ग्रेच्युटी बकाया होने के कारण मजदूरों में प्रबंधन और यूनियन के खिलाफ भारी आक्रोश है.पढे़ं पूरी खबर…

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समस्तीपुर से गिरिजा नन्दन शर्मा की रिपोर्ट

Samastipur News: समस्तीपुर जिले का गौरव कहे जाने वाले एकमात्र रामेश्वर जूट मिल मुक्तापुर में सात महीने के लंबे सन्नाटे के बाद एक बार फिर सायरन की गूंज तो सुनाई दी, लेकिन मिल के आम मजदूरों के चेहरों पर रौनक लौटने के बजाय मायूसी और आक्रोश साफ नजर आ रहा है. अधिकारियों और प्रबंधन द्वारा मिल चालू करने की घोषणा के बाद भी मजदूर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं.

सायरन बजाकर रस्म अदायगी, पर कच्चा माल नदारद

विगत सात महीनों से बंद पड़ी इस मिल का ताला खोलने के लिए उप श्रम आयुक्त (दरभंगा) राकेश रंजन, श्रम अधीक्षक (समस्तीपुर) संजय पासवान, पर्सनल मैनेजर फ्रांको घोष, कमर्शियल मैनेजर एसके जैन, मजदूर यूनियन के अध्यक्ष नौशाद आलम तथा महासचिव अमरनाथ सिंह ने संयुक्त रूप से सायरन बजाकर मिल को चालू तो कर दिया, लेकिन ग्राउंड जीरो पर सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है. मजदूरों का कहना है कि किसी भी जूट मिल में उत्पादन शुरू करने के लिए सबसे पहले कच्चे जूट (कच्चा माल) की जरूरत होती है. वर्तमान में मिल परिसर में कच्चे माल का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. ऐसे में यह गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि बिना कच्चे माल के मिल में उत्पादन आखिर कैसे शुरू होगा?

प्रबंधन और यूनियन के दावों पर उठे सवाल

आम मजदूरों की मानें तो मिल को चालू करने का यह पूरा घटनाक्रम महज एक ‘स्वांग’है. खुद प्रबंधन और मजदूर संघ के बयानों के मुताबिक, मिल का सायरन भले ही बज गया हो, लेकिन मजदूरों को वास्तव में काम पाने के लिए अभी महीनों का इंतजार करना पड़ेगा. आरोप है कि प्रबंधन अपनी सुविधानुसार मिल को खोलता और बंद करता रहता है. जब भी मजदूर अपने हक और बकाए की आवाज उठाते हैं, तो मिल को बंद कर उनकी आवाज को दबा दिया जाता है. मजदूरों के अनुसार, असली मिल उसी दिन चालू मानी जाएगी, जब उनका लंबित बकाया भुगतान अद्यतन किया जाए, उन्हें नियमित काम मिले और दिहाड़ी सुचारू रूप से जारी रहे.

2010 से लंबित है ईपीएफ और ग्रेच्युटी

मजदूरों की सबसे बड़ीपीड़ा उनका रुका हुआ पैसा है. मिल में कार्यरत और सेवानिवृत्त मजदूरों का ईपीएफ और ग्रेच्युटी का भुगतान साल 2010 से ही लंबित है. स्थिति इतनी दयनीय है कि पिछले 16 वर्षों से अपने हक की गाढ़ी कमाई की राह देखते-देखते कई मजदूर इस दुनिया से भी चल बसे, लेकिन प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. आरोप है कि विभिन्न मजदूर संगठन सिर्फ प्रबंधन के इशारे पर अपनी तरफदारी में लगे हुए हैं और किसी ने भी हक के लिए कोई सार्थक पहल नहीं की.

सैकड़ों मजदूरों की उपस्थिति में हुआ आयोजन: इस उद्घाटन के मौके पर मिल परिसर में लाल बाबू राय, शंकर राय, देवेंद्र पासवान, मुन्ना पासवान, रंजीत पासवान समेत सैकड़ों मजदूर उपस्थित रहे. कार्यक्रम के दौरान जनरल मैनेजर फ्रांको घोष ने श्रम आयुक्त को गुलदस्ता देकर सम्मानित भी किया, लेकिन इस औपचारिक सम्मान समारोह के पीछे मजदूरों का दर्द और भविष्य की अनिश्चितता साफ देखी जा सकती थी.

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By SUMIT KUMAR

सुमित पत्रकारिता में पिछले 4 वर्षों से सक्रिय। प्रभात खबर के प्रिंट मीडिया के साथ काम करने के बाद वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम से जुड़े हुए हैं। क्राइम, हाईपरलोकल, स्वास्थ्य विभाग व राजनीतिक रिपोर्टिंग में विशेष रुचि और अनुभव रखते हैं। क्षेत्रीय मुद्दों और जनसरोकार की खबरों को सशक्त तरीके से उठाने के लिए जाने जाते हैं।

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