सहरसा में जलजमाव वाली जमीन से किसानों ने उगाया 'सफेद सोना', सलखुआ में मखाना क्रांति की नई कहानी
Published by : Pratyush Prashant Updated At : 07 Jun 2026 3:20 PM
सहरसा - खेतों में लहलहाते मखाना फसल
Saharsa News:कभी जिन खेतों में सालभर पानी जमा रहने से किसान परेशान रहते थे, आज वहीं से लाखों की उम्मीदें निकल रही हैं. सलखुआ के किसानों ने जलभराव को अभिशाप नहीं, अवसर बनाया और मखाना खेती के दम पर आर्थिक बदलाव की नई इबारत लिख दी.
सहरसा से वशिष्ठ कुमार की रिपोर्ट.
Saharsa News: सहरसा जिले के सलखुआ प्रखंड में किसानों ने यह साबित कर दिया है कि चुनौतियां ही सफलता का रास्ता बन सकती हैं. वर्षों से जलभराव की समस्या झेल रहे इलाके के किसानों ने बंजर समझी जाने वाली जमीन को मखाना उत्पादन का केंद्र बना दिया है. आज यही खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ पूरे क्षेत्र में ‘मखाना क्रांति’ की नई कहानी लिख रही है.
जब परेशानी बनी कमाई का जरिया
सलखुआ और मोबारकपुर पंचायत के कई खेत हर वर्ष बारिश के बाद महीनों तक पानी में डूबे रहते थे. इससे धान, गेहूं समेत पारंपरिक फसलों की खेती मुश्किल हो जाती थी. लगातार नुकसान झेल रहे किसानों ने हालात से हार मानने के बजाय नई राह तलाशने का फैसला किया.
किसानों ने जलभराव वाली जमीन को पोखर का स्वरूप देकर मखाना की खेती शुरू की. शुरुआत छोटी थी, लेकिन परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर निकले. धीरे-धीरे यह प्रयोग पूरे इलाके में सफलता की मिसाल बन गया.
19 किसानों की पहल ने बदल दी तस्वीर
इस बदलाव की नींव 19 प्रगतिशील किसानों ने रखी. सामूहिक प्रयास और नई सोच के साथ शुरू हुई यह पहल आज क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुकी है. जिन खेतों को कभी बेकार माना जाता था, वहीं अब किसानों को नियमित आमदनी मिल रही है.
स्थानीय किसान बताते हैं कि मखाना की खेती ने न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि गांव में रोजगार के अवसर भी बढ़ाए हैं.
कम निवेश, तगड़ा मुनाफा
मखाना खेती की सबसे बड़ी ताकत इसकी लाभप्रदता है. किसानों के अनुसार एक एकड़ में लगभग 15 हजार रुपये की लागत आती है, जबकि मुनाफा लागत से कई गुना अधिक मिलता है.
बाजार में मखाना 600 से 1200 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है. बेहतर दाम मिलने से किसानों की सालाना आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है. कई किसान अतिरिक्त 50 हजार रुपये या उससे अधिक की कमाई कर रहे हैं.
बदली गांव की अर्थव्यवस्था
मखाना खेती ने सिर्फ खेतों की तस्वीर नहीं बदली, बल्कि गांव की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया है. जहां कभी बेरोजगारी और पलायन की चर्चा होती थी, वहां अब आत्मनिर्भरता और नवाचार की बातें हो रही हैं.
कृषि विशेषज्ञ भी इस मॉडल को जलभराव प्रभावित इलाकों के लिए उपयोगी मान रहे हैं. उनका कहना है कि यदि किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और बेहतर बाजार उपलब्ध कराया जाए तो यह मॉडल बिहार के अन्य जिलों में भी नई कृषि क्रांति ला सकता है.
जलभराव से ‘सफेद सोना’ तक का सफर
सलखुआ के किसानों ने दिखा दिया है कि खेती में सफलता सिर्फ संसाधनों से नहीं, बल्कि सोच से भी मिलती है. जहां पानी कभी खेती की सबसे बड़ी बाधा था, वहीं आज वही पानी किसानों के लिए ‘सफेद सोना’ उगा रहा है. यह कहानी सिर्फ मखाना की नहीं, बल्कि संघर्ष, नवाचार और आत्मविश्वास की भी है.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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