भीतरघात से हारी भाजपा, दस साल बाद जला लालटेन

Published at :08 Nov 2015 6:44 PM (IST)
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भीतरघात से हारी भाजपा, दस साल बाद जला लालटेन

भीतरघात से हारी भाजपा, दस साल बाद जला लालटेन सहरसा विधानसभा से राजद की जीत के मायनेसहरसा नगर. रविवार को आया चुनाव परिणाम कोसी क्षेत्र के लिए कई मायने में अहम रहा. जदयू -राजद अपना गढ़ बचाने में कामयाब रहे. वहीं सहरसा विधानसभा में बीते दस साल से कब्जा जमाये भाजपा को मात खानी पड़ी. […]

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भीतरघात से हारी भाजपा, दस साल बाद जला लालटेन सहरसा विधानसभा से राजद की जीत के मायनेसहरसा नगर. रविवार को आया चुनाव परिणाम कोसी क्षेत्र के लिए कई मायने में अहम रहा. जदयू -राजद अपना गढ़ बचाने में कामयाब रहे. वहीं सहरसा विधानसभा में बीते दस साल से कब्जा जमाये भाजपा को मात खानी पड़ी. चुनाव घोषणा के शुरुआती दौर से विपक्षी भी सहरसा की सीट पर एनडीए को मजबूत मान कर चल रहे थे. दूसरी तरफ चुनाव परिणाम ने भाजपा नेताओं की पोल खोल दी है. राजनीतिक जानकारों की माने तो बूथ स्तर पर चुनावी लड़ाई जीतने में माहिर भाजपाई मतदान के दिन निष्क्रिय रहे. अपनों ने ही पलट दी बाजी!जाति आधारित गणना में आगे माने जाने वाली भाजपा की हार को लेकर क्षेत्र में कई तरह की चर्चाएं हो रही है. कोई इसे आपसी गुटबाजी तो कोई निजी स्वार्थ में पार्टी के नेताओं द्वारा किये गये भीतरघात का परिणाम बता रहा है. ज्ञात हो कि जिले में सहरसा विधानसभा से उम्मीदवारी को लेकर पार्टी के कई लोग प्रयासरत थे. पार्टी द्वारा निवर्तमान विधायक आलोक रंजन को उम्मीदवारी देकर अटकलों पर विराम लगा दिया गया था. जिसके बाद विरोधी खेमे के लोगों द्वारा अपने समर्थकों व स्वजातीय वोटरों को दूसरे दलों के प्रति लामबंद करने की कोशिश चुनावी परिणाम में देखने को मिली.गढ़ में मात खा गयी भाजपासहरसा विधानसभा के तहत कहरा, सौरबाजार प्रखंड व नगर परिषद के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं. बीते कई चुनावों से भाजपा ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र कहरा व वैश्यों के जनाधार वाली नगर परिषद को अपना गढ़ मानती रही है. जबकि सौरबाजार में राजद हमेशा बड़ी ताकत के रुप में उभरती रही है. राजद में रही एकजुटतावर्तमान विधानसभा चुनाव का परिणाम राजद कार्यकर्ताओं के लिए उमंग से भरा हुआ है. राजद में अरुण यादव को प्रत्याशी बनाये जाने के बाद भी पार्टी में सार्वजनिक रूप से कार्यकर्ताओं ने विरोध जताया था. लेकिन पार्टी के सिद्धांत व नेतृत्व की नीति ने विरोध की राजनीति को खत्म कर दिया था. ज्ञात हो कि टिकट नहीं मिलने से मायूस पार्टी के नेताओं ने भी राजद प्रत्याशी के पक्ष में जम कर पसीना बहाया था.

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