कोसी में खत्म हो गयी मड़ुआ की खेती, रोटी को तरस रहे लोग
Updated at : 14 Dec 2017 4:49 AM (IST)
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कहावत तक ही सीमित रह गया मड़ुआ शब्द मधुमेह व रक्तचाप के लिए वरदान है मड़ुआ, खून की कमी को भी करता है दूर सोनवर्षाराज : मड़ुआ अब सिर्फ कहावत तक ही सीमित रह गयी है. बहुत थोड़ा के लिए आज भी यदा-कदा इस शब्द का प्रयोग होता है. लेकिन आधुनिकता के इस दौर में […]
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कहावत तक ही सीमित रह गया मड़ुआ शब्द
मधुमेह व रक्तचाप के लिए वरदान है मड़ुआ, खून की कमी को भी करता है दूर
सोनवर्षाराज : मड़ुआ अब सिर्फ कहावत तक ही सीमित रह गयी है. बहुत थोड़ा के लिए आज भी यदा-कदा इस शब्द का प्रयोग होता है. लेकिन आधुनिकता के इस दौर में लगभग दो पीढ़ी के लोगों ने इसे देखा तक नहीं है. इसे चखा भी नहीं है. बाजरे प्रजाति के मोटे अनाज मड़ुवा को रागी भी कहते हैं. इसका वैज्ञानिक नाम इल्यूसाइन कोरकाना है. यह मूलत: बिहार, झारखंड, उतराखंड सहित उत्तर भारत में उपजाए जाने वाली मोटी फसल के रूप में कभी विख्यात था. लेकिन आज मड़ुवा की खेती के लिए विख्यात कोसी का इलाका भी मड़ुवा की रोटी खाने के लिए तरस रहा है. कृषि विभाग भी इसकी खेती के प्रति पूरी तरह उदासीन बनी हुई है.
बंजर में भी मड़ुआ की होती है पैदावार: मड़ुआ की रोपाई जुलाई से अगस्त माह के बीच की जाती है एवं इसकी कटाई सितंबर-अक्तूबर के बीच होती है. इसकी खेती के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है. इसकी खेती बंजर जमीन पर भी संभव होती है. इस पौधे की खासियत यह है कि मड़ुवा की फसल एवं दाने को सुरक्षित रखने के लिए किसी तरह के कीटनाशक के इस्तमाल की जरूरत नहीं होती है.
कई रोगों में है लाभदायक: मड़ुआ मधुमेह के मरीजों के लिए वरदान है. चावल एवं गेहूं की अपेक्षा इसमें उच्च स्तर के फाइबर पाये जाते हैं. जो रक्त में शर्करा की मात्रा को संतुलित रखता है. यह हृदय रोग के मरीजों के लिए भी रामवाण साबित होता है. इसके सेवन से खून में मौजूद हानिकारक चर्बी घट जाती है. इसी कारण इस रोग में भी मड़ुआ का सेवन बहुत फायदेमंद होता है. यह रक्तचाप को भी संतुलित करता है. क्षारीय अनाज होने की वजह से इसके नियमित सेवन से अल्सर जैसी बिमारी की संभावना न्यूनतम हो जाती है. मड़ुआ का सीधा संबंध भोजन के प्रमुख अवयव खनज से है. लिहाजा यह एनिमिया के मरीजों की अचूक दवा होती है. मड़ुआ में लौह अयस्क की मात्रा ज्यादा होने की वजह से गर्भवती महिला एवं बच्चों में यह खून की कमी को दूर करता है. मड़ुआ में पर्याप्त मात्रा में कैल्सियम व फास्फोरस पाए जाने से बच्चों के हड्डी व दांत को मजबूत करने के लिए यह समुचित खाद्य माना जाता है. मड़ुवा के सेवन से चेहरे पर पड़ने वाली झुर्रिया भी देर से पड़ती है.
बाजार नहीं, फिर भी है कीमत
महिलाओं के महत्वपूर्ण पर्व जिउतीया के उपवास से एक दिन पूर्व मड़ुआ की रोटी खाने की परम्परा चली आ रही है. विलुप्त होते जा रहे मड़ुआ की वजह से जिउतीया के पूर्व अक्सर परिवार के पुरुष बाजार में मड़ुआ की खोज करते नजर आते हैं. मडुवा का उपयोग दवा, नमकीन, बिस्कुट, रोटी सहित अन्य चीजों के निर्माण में किया जाता है. लेकन मड़ुआ का बाजार नहीं होने व इसकी कीमत नहीं मिलने के कारण किसान इसकी खेती से लगातार विमुख होते जा रहे हैं. अनाज उपजाने के बाद किसानों को इसके खरीदार की तलाश करनी पड़ती है. हालांकि इसके बावजूद मडुवा का बाजार भाव चार हजार से पांच हजार रुपया प्रति क्विंटल है जो किसी भी खाद्य फसल की अपेक्षा बहुत ज्यादा है. इसका दूसरा बड़ा कारण आधुनिकता की ओर बढ़ते समाज का भी है. जो काला दिखने वाली मड़ुआ से दूर रहना चाहते हैं.
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