बिजली-पानी के लिए तरस रहे हैं ग्रामीण

Published at :03 Mar 2017 5:16 AM (IST)
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बिजली-पानी के लिए तरस रहे हैं ग्रामीण

उपेक्षा. इटवां गांव की महादलित बस्ती तक नहीं पहुंची अब तक विकास की रोशनी बच्चे स्लेट-पेंसिल की जगह पकड़ते हैं चूहा व मछली दावथ (रोहतास) : ईटवां गांव के महादलित परिवारों का विकास किसी भी क्षेत्र में अब तक नहीं हो पाया है. कहा जाये तो इन लोगों के समीप विकास की रोशनी पहुंच ही […]

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उपेक्षा. इटवां गांव की महादलित बस्ती तक नहीं पहुंची अब तक विकास की रोशनी

बच्चे स्लेट-पेंसिल की जगह पकड़ते हैं चूहा व मछली
दावथ (रोहतास) : ईटवां गांव के महादलित परिवारों का विकास किसी भी क्षेत्र में अब तक नहीं हो पाया है. कहा जाये तो इन लोगों के समीप विकास की रोशनी पहुंच ही नहीं पायी है. अब भी झोंपड़ी में रहना, मैले-कुचैले कपड़े में खेतों में चूहा व आहर-गड्ढों में मछली पकड़ना, इनके बच्चों की दिनचर्या और पहचान बन गयी है, जबकि कोई भी चुनाव इनके विकास और बेहतरी के चर्चे के बिना संपन्न नहीं होते. चाहे पंचायत का चुनाव हो या विधानसभा अथवा देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा का हो. दशकों से भिन्न-भिन्न पार्टियों और दलों की सरकारें आयीं और गयीं. लेकिन, इन लोगों के हालात ज्यों का त्यों बना हुआ है. इनके बच्चे पूरे दिन चूहे और मछली ही पकड़ते रहे हैं. कभी इनके हाथ में किसी ने स्लेट और पेंसिल पकड़ाने का प्रयास नहीं किया.
सरकार व इनके नुमाइंदे लाख दावा कर लें, लेकिन इन महादलितों के जीवन स्तर को सुधारने का एक ईमानदार प्रयास किसी ने नहीं किया. हां, इनके वोट लेने का सबने प्रयास किया और ये लोग भी केवल वोट के ठेकेदारों के लिए वोट बैंक बन कर रह गये. ईटवां में पचास घर मुसहर जाति के लोग हैं. इनकी आबादी 350 है. इन लोगों के दो सौ के करीब वोट हैं, जो ईटवा गांव के कुल वोट का 18 फीसदी है. इनके घरों तक बिजली की भी व्यवस्था नहीं है. कितने वर्षों से गरीबों के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन उनका लाभ भी इन लोगों को नहीं मिल पाता है. मसलन वृद्धावस्था पेंशन, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना, इंदिरा आवास, छात्रवृत्ति, पोशाक, व पोषाहार योजना सहित सरकार के कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सबको नहीं मिलता है. इस महादलित बस्ती में बीस लोगों को वृद्धावस्था पेंशन मिलता है. सस्ते दर पर अनाज भी तीस से पैंतीस परिवारों को ही मिलता है. वह भी हर माह नहीं मिल पाता है. किसी माह में इनके पास पैसे नहीं होते हैं, तो किसी माह में राशन दुकानदार बहाना बनाकर नहीं देता है. इंदिरा आवास जो अब प्रधानमंत्री आवास के नाम से जाना जा रहा है, का लाभ भी इन्हें नहीं मिल पा रहा है. 2004-05 में आठ परिवारों के लिए इंदिरा आवास की राशि आवंटित हुई थी, परंतु आवास भी अधूरा रह गया. आवास की राशि बिचौलियों की भेंट चढ़ गयी. छात्रवृत्ति व पोशाक की राशि नहीं मिलती, क्योंकि इनके अधिकतर बच्चे स्कूल नहीं जाते व जो जाते हैं, उनकी उपस्थिति 75 प्रतिशत नहीं पूरी होती है. इधर, कुछ वर्षों से एमडीएम के कारण स्कूलों में इनके कुछ बच्चे जा रहे थे, वह भी अब न के बराबर संख्या रह गयी है. इसके पीछे का कारण मध्याह्न भोजन योजना में अनियमितता व भेदभाव है. इनके जीवन यापन का मूल साधन मजदूरी व लकड़ियां चुन कर बेचना है. बाग-बगीचे तो हैं नहीं, जहां से लकड़ी चुन सकें. खेती में भी सीजन में ही काम मिल पाता है. इससे भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है. इनकी महिलाएं खेतों में धान व गेहूं की बालियां इकट्ठा कर कुछ दिनों के खाद्यान की जरूरत पूरी कर लेती थीं, पर मशीनीकरण के कारण अब वह भी संभव नहीं रहा. मनरेगा में भी एक वर्ष से अधिक समय से काम नहीं चल रहा है. उसमें भी कुछ लोग को महीने-डेढ़ महीने काम मिल जाता था. ईटवां के इस दलित बस्ती में पेयजल के लिए दो हैंडपंप है, उसमें भी एक खराब ही रहता है. पानी निकासी के लिए नाली नहीं होने के कारण बस्ती के आगे कीचड़ फैला हुआ है. ईटवां पंचायत में स्वच्छता योजना एक वर्ष से अधिक समय से चल रहा है, परंतु ईटवां के महादलितों को इसकी जानकारी नहीं है और जानकारी हो भी, तो ये लोग शौचालय कैसे बनवायेंगे, जिनके पास दस दिन खाने के लिए भी अनाज नहीं है. इनके घरों के आगे भी गंदगी फैली हुई है. अब सवाल उठना लाजिमी है कि शासन, प्रशासन, सामाजिक कार्यकर्ता व व्यवस्था ने इन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ने के लिए आज तक क्या किया और यदि कुछ किया है, तो धरातल पर दिखता क्यों नहीं.
अगर नहीं किया तो कब होगा.
क्या कहते हैं लोग
इस बस्ती के मुन्ना मुसहर, कातिक मुसहर, मोतीचंद व बबन मुसहर बताते हैं कि हम लोगों को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलता व डीलर भी समय पर राशन नहीं देता है. अब काम भी नहीं मिल रहा है. घर भी नहीं मिल रहा है. हमलोग कहां जायें, कोई नहीं सुनता. मुखिया-सरपंच कुछ नहीं करते. जैसे-तैसे किसी तरह गुजर कर रहे हैं. वार्ड सदस्य कामता राम ने बताया कि चुनाव के बाद अभी पैसा नहीं आया है. योजना दी गयी है. मुखिया सत्येंद्र शर्मा ने कहा कि पैसा आने पर काम किया जायेगा.
क्या कहते हैं अधिकारी
गांव में विकास के कार्य का चयन पंचायत की ग्रामसभा में की जाती है. प्राथमिकता के अाधार पर योजना का चयन किया जाता है. महादलित परिवार के लोगों से अभी तक कोई लिखित शिकायत नहीं मिली है, मिलने पर पीडीएस की जांच करायी जायेगी.
रितेश कुमार, बीडीओ
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