मां जीवच्छ के दर्शन से पूरी होती है मनोकामना: जानें 'जीव के बदले जीव' देने वाली इस शक्तिपीठ की महिमा

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मां जीवच्छ मंदिर

Maa Jivachh Temple History: पूर्णिया जिले के जलालगढ़ में स्थित प्रसिद्ध मां जीवच्छ मंदिर कोसी-सीमांचल सहित नेपाल और बंगाल तक असीम आस्था का केंद्र है. 'जीव के बदले जीव' देने की अनूठी धार्मिक मान्यता वाले इस मंदिर के पोखर का पानी कभी नहीं सूखता और यहाँ मन्नत पूरी होने पर बलि नहीं, बल्कि पाठी का दान दिया जाता है.

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पूर्णिया के जलालगढ़ से निकेश राय की रिपोर्ट

Maa Jivachh Temple History: ‘जीव के बदले जीव’ के रूप में ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध मां जीवच्छ मंदिर सनातनी आस्था और शक्ति का एक अनूठा केंद्र है. यहाँ ‘जीव के बदले जीव’ का बेहद पवित्र अर्थ है—निःसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति होना और मन्नत पूरी होने पर माता के चरणों में चढ़ावे के रूप में पाठी (बकरी का बच्चा) का जीवित दान करना (यहाँ बलि देने की प्रथा पूरी तरह वर्जित है). जलालगढ़ रेलवे स्टेशन से महज 2 किलोमीटर दक्षिण में एक वीरान लेकिन शांत क्षेत्र में स्थित यह मंदिर शक्ति और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.

तीन ऐतिहासिक पोखरों के बीच ऊंचे टीले पर है मंदिर

मंदिर की भौगोलिक बनावट और प्राकृतिक कड़ियों से जुड़े मुख्य आंकड़े व विशेषताएं इस प्रकार हैं. मां जीवच्छ का यह भव्य मंदिर एक काफी ऊंचे प्राकृतिक टीले पर स्थित है.

इस मंदिर के तीनों ओर बड़े-बड़े और ऐतिहासिक पोखर (तालाब) बने हुए हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, सदियों पुराने इन पोखरों का पानी आज तक भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखा है. मंदिर के ठीक उत्तर में ‘जीवच्छ पोखर’, उत्तर-पूर्व के छोर पर ऐतिहासिक ‘गंगा सागर पोखर’ और दक्षिण छोर पर ‘मरोच्छ पोखर’ स्थित है. तीन दिशाओं से जल स्रोतों से घिरे होने के कारण इस सिद्धपीठ का नजारा बेहद अलौकिक और रमणीय दिखाई देता है.

कोसी-सीमांचल में प्रसिद्ध है चार दिनों का ‘सिरवा मेला’

मंदिर के वार्षिक आयोजनों और सांस्कृतिक कड़ियों की जानकारी भी काफी समृद्ध है. हर साल अप्रैल के महीने में मां जीवच्छ मंदिर परिसर में चार दिनों तक चलने वाले प्रसिद्ध ‘सिरवा मेला’ का आयोजन किया जाता है.

यह मेला न केवल जलालगढ़ बल्कि पूरे कोसी और सीमांचल संभाग में बेहद लोकप्रिय है. इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यहाँ मिलने वाला विशेष प्रसाद है. मेले में धान के लावा से पारंपरिक तरीके से तैयार होने वाला ‘खोय’ (ओखरा) श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रसिद्ध है, जिसे लोग प्रसाद के रूप में अपने घर ले जाना नहीं भूलते.

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“मंदिर के इतिहास और मान्यताओं को लेकर क्षेत्र के विद्वान पंडित चंद्रशेखर ठाकुर बताते हैं कि जीवच्छ मंदिर के पवित्र पोखर में स्नान करने का एक विशेष आध्यात्मिक महात्म्य है. दूर-दूर से आने वाले निःसंतान दंपती पूरी श्रद्धा के साथ पहले इस पोखर में स्नान करते हैं और फिर गीले कपड़ों में ही माता के दरबार में आकर संतान प्राप्ति के लिए खोइछा भरते हैं. मां के आशीर्वाद से यहाँ आने वाले हर दंपती के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है.” — पंडित चंद्रशेखर ठाकुर, मुख्य विचारक

Maa Jivachh Temple History: मन्नत पूरी होने पर होता है मुंडन और स्वर्ण दान

माता के दरबार में चढ़ावे और धार्मिक रीति-रिवाजों की परंपराएं भी बहुत अनूठी हैं. आम दिनों में श्रद्धालु मां को इलायची दाना और बताशे का भोग लगाते हैं. वहीं, जिन श्रद्धालुओं की बड़ी मन्नतें पूरी होती हैं, वे अपनी श्रद्धा के अनुसार माता को सोने और चांदी के बहुमूल्य आभूषण भी समर्पित करते हैं. सबसे खास बात यह है कि जिन माताओं की संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होती है, वे अपने बच्चों का पहला मुंडन संस्कार (Chूडाकर्म) किसी अन्य नदी या घाट पर नहीं, बल्कि इसी पवित्र जीवच्छ पोखर के घाट पर गाजे-बाजे के साथ संपन्न कराती हैं. यही कारण है कि यह स्थल सालों भर सनातनी आस्था से सराबोर रहता है.

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Divyanshu Prashant

लेखक के बारे में

By Divyanshu Prashant

दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।

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