कला भवन की मासिक संगोष्ठी में 'कथाकार रुपचंद' का लोकार्पण, साहित्यकारों ने की कृति की सराहना

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कला भवन साहित्य विभाग की मासिक संगोष्ठी में 'कथाकार रुपचंद' कहानी संग्रह का लोकार्पण करते अतिथि एवं उपस्थित साहित्यकार.

कला भवन साहित्य विभाग की मासिक संगोष्ठी में 'कथाकार रुपचंद' कहानी संग्रह का लोकार्पण करते अतिथि एवं उपस्थित साहित्यकार.

पूर्णिया के कला भवन में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कामेश्वर पंकज के बहुप्रतीक्षित कहानी संग्रह 'कथाकार रुपचंद' का विधिवत लोकार्पण हुआ. संगोष्ठी में साहित्यकारों ने कृति की संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकारों पर आधारित कहानियों की खूब प्रशंसा की.

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पूर्णिया से सत्येन्द्र सिन्हा गोपी की रिपोर्ट

पूर्णिया : कला भवन साहित्य विभाग की मासिक संगोष्ठी के अंतर्गत वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कामेश्वर पंकज के कहानी संग्रह 'कथाकार रुपचंद' का लोकार्पण किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता अंग्रेजी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. ऊषा शरण ने की, जबकि डॉ. शिव मुनि यादव मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे. समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ.

कहानी संग्रह को बताया पठनीय और संवेदनशील

साहित्य विभाग की संयोजिका डॉ. निरुपमा राय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि संग्रह में शामिल 14 कहानियां और 9 लघुकथाएं विषय, शिल्प और संवेदना की दृष्टि से विशिष्ट एवं पठनीय हैं.

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. ऊषा शरण ने 'रूपचंद मर गया', 'पापा एक मौका दे दो' और 'मीठी यादें' जैसी कहानियों की चर्चा करते हुए डॉ. पंकज को संवेदनशील कथाकार और प्रभावशाली रचनाकार बताया.

कथाओं में प्रेमचंद और रेणु की परंपरा की झलक

मुख्य अतिथि डॉ. शिव मुनि यादव ने कहा कि डॉ. कामेश्वर पंकज की कहानियों में प्रेमचंद, अनूप लाल मंडल और फणीश्वरनाथ रेणु की साहित्यिक परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है. उन्होंने 'गरीबां दशहरा और मोहर्रम' तथा 'चलो हमारे गांव' जैसी कहानियों को सामाजिक सरोकारों से जुड़ी महत्वपूर्ण रचनाएं बताया.

विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रभात नारायण झा ने कहा कि पंकज की कहानियों में ग्रामीण जीवन, प्रवासी मजदूरों की समस्याएं और सामाजिक यथार्थ का सशक्त चित्रण देखने को मिलता है.

'अयोध्या में ज़फ़र सिद्दीकी' को बताया संग्रह की श्रेष्ठ कहानी

प्रो. शंभूलाल वर्मा ने 'अयोध्या में ज़फ़र सिद्दीकी' को संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी बताते हुए उसके कथ्य और प्रस्तुति की विस्तृत समीक्षा की.

वहीं, केबी झा कॉलेज, कटिहार के पूर्व प्राध्यापक डॉ. दिलीप कुमार यादव ने 'पापा एक मौका दे दो' को महिला सशक्तिकरण पर आधारित प्रभावशाली कहानी बताते हुए लेखक की रचनात्मक क्षमता की सराहना की.

लेखकीय अनुभवों को किया साझा

कथाकार डॉ. कामेश्वर पंकज ने अपने वक्तव्य में कहा कि उनकी सभी कहानियां जीवन के वास्तविक अनुभवों से उपजी हैं. उन्होंने कहा कि शिल्प में भले कुछ समझौते हुए हों, लेकिन कथ्य से कभी समझौता नहीं किया.

डॉ. केके चौधरी ने 'मुरली मंडल उदास है', 'तुम ही बताओ', 'चलो हमारे गांव' और 'मैं बूढ़ा हो लेता हूं' जैसी कहानियों पर विस्तार से चर्चा की.

लघुकथा पाठ और श्रद्धांजलि के साथ हुआ समापन

संगोष्ठी में स्थानीय साहित्यकारों ने विभिन्न विषयों पर लघुकथाओं का पाठ कर कार्यक्रम को साहित्यिक गरिमा प्रदान की. इस अवसर पर पूनम देवी, किशोरी बबीता चौधरी, डॉ. निशा प्रकाश, डॉ. उषा झा रेणु, रानी सिंह, वंदना कुमारी, रंजना कुमारी, आयुष कुमार, मनोज कुमार राय, दिनकर दीवाना, कुमार दिवाकर, सुनील समदर्शी, विनायक रंजन, छाया जोशी, जया सरकार, छोटू घोष, मलय झा, विनीत राज, अजय सिंह और मुकेश कुमार सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित रहे.

कार्यक्रम के अंत में साहित्यकार एवं 'सांवली' पत्रिका के संपादक जवाहर किशोर प्रसाद तथा कलाधर की स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई. धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निरुपमा राय ने किया.

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Shruti Kumari

लेखक के बारे में

By Shruti Kumari

श्रुति कुमारी एक पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं। उन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से अंग्रेजी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया है। वर्तमान में वे प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें विभिन्न प्लाटफॉर्म्स पर डिजिटल पत्रकारिता और कंटेंट राइटिंग का लगभग दो वर्षों का अनुभव है। अपने समाचार पोर्टल पर कार्य करते हुए उन्होंने समाचार लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण में अनुभव हासिल किया। सामाजिक मुद्दों, महिला सशक्तिकरण, राजनीति, शिक्षा और लाइफस्टाइल जैसे विषयों पर लिखना उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है। इसके अलावा वे डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए स्क्रिप्ट राइटिंग करती हैं तथा हिंदी कविता और अंगिका भाषा में लेखन का भी शौक रखती हैं। प्रकृति से उनका विशेष लगाव है और वे मानती हैं कि संवेदनशील, तथ्यपरक और जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है।

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