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Bihar Assembly Election 2025 News : विधानसभा चुनाव में इस बार गरमा रहा पूर्णिया के औद्योगिक विकास का मुद्दा

Updated at : 06 Nov 2025 12:28 AM (IST)
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Bihar Assembly Election 2025 News : विधानसभा चुनाव में इस बार गरमा रहा पूर्णिया के औद्योगिक विकास का मुद्दा

Bihar Assembly Election चार दशकों में न तो नये उद्योग लगाये जा सके और न ही चालू हुए पुराने व बंद उद्योग, सालों से उठायी जा रही जिले में जूट, मक्का व मखाना पर आधारित उद्योग की मांग

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Bihar Assembly Election 2025 News : पूर्णिया. विधानसभा चुनाव में इस बार पूर्णिया के औद्योगिक विकास का मुद्दा गरमा रहा है. जिले के औद्योगिक विकास को लेकर मतदाता सवाल भी खड़े कर रहे हैं. पूर्णियावासियों को यह सवाल साल रहा है कि पिछले चार दशकों में यहां न तो नये उद्योग लगाये जा सके और न ही बंद पड़े पुराने उद्योगों को चालू किया जा सका. यही वजह है कि नेताजी को इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा. दरअसल, यह विडंबना रही है कि बारंबार वायदों और घोषणाओं के बावजूद औद्योगिक विकास के मामले में पूर्णिया पिछड़ा और अविकसित रह गया है. यहां उल्लेख्य है कि हर बार चुनावी मौसम में पूर्णिया के औद्योगिक विकास के लिए वोटरों को पूरा भरोसा दिलाया जाता है, पर चुनाव के बाद इसकी चर्चा तक नहीं होती. याद रहे कि बनमनखी चीनी मिल हर चुनाव में मुद्दा बनता रहा है, पर कभी इस पर काम नहीं हो सका. चीनी मिल के विस्तृत भूखंड को बियाडा में लिये जाने और उस पर नये उद्योग लगने का भरोसा भी टूटने लगा है.

घोषणाओं पर नहीं हुआ अमल

पिछले चुनाव के दौरान पूर्णिया में कृषि आधारित उद्योग लगाये जाने की घोषणा भी की गयी थी पर अब तक इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी. वैसे, इस बीच जिले के परोरा में इथेनॉल फैक्ट्री खोली गयी है जबकि इस तरह की कई फैक्ट्रियों की जरूरत महसूस की जाती रही है. जिस तरह यहां व्यापक पैमाने पर मक्का और मखाना का उत्पादन हो रहा है उस हिसाब से इससे संबंधित कारखाना लगाये जाने की मांग आजतक आश्वासनों की झोली में झूल रही है. दरअसल, लोग मानते हैं कि उद्योग लगाये जाने से यहां रोजगार के ढेर सारे अवसर मिलते और युवाओं को काम की तलाश में बाहर जाने की विवशता नहीं होती. पूर्णिया के बुजुर्गों की मानें तो नये उद्योग नहीं लगाये गये, कम से कम बंद पड़े पुराने उद्योगों को ही चालू कर दिया जाता, तो पूर्णिया आज विकसित शहरों की कतार में खड़ा होता, बेरोजगारी भी कम होती.

औद्योगिक विकास पर नहीं दिखी गंभीरता

यह विडंबना रही कि औद्योगिक विकास के मुद्दे को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया. याद रहे कि 1986 में पूर्णिया सिटी के औद्योगिक प्रांगण में कीटनाशक दवा कारखाना शुरू किया गया था. करीब 2.65 करोड़ की लागत से स्थापित इस कारखाने में कई लोगों को काम भी मिले थे, पर विसंगतियों के कारण यह कारखाना बंद हो गया. इससे पहले बेलौरी में भारतीय खाद्य निगम की ओर से माडर्न राइस मिल स्थापित किया गया था, पर बाद के दिनों में इसे भी बंद कर दिया गया. इसी तरह पूर्णिया सिटी के औद्योगिक प्रांगण में बिहार राज्य वस्त्र निगम की ओर से सूत कारखाना की नींव डाली गयी थी. 80 के दशक में यह कारखाना खूब चल रहा था, जिसमें स्थानीय बेरोजगारों को नौकरी भी दी गयी थी. कहते हैं, वित्तीय विसंगतियों के कारण यह कारखाना भी बंद हो गया.

बंद हो गयीं कई लघु औद्योगिक इकाइयां

पूर्णिया के लिए यह भी विडंबना रही है कि चावल और सरसों तेल की कई लघु औद्योगिक इकाइयां सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के कारण बंद हो गयीं. बीच के दौर में यहां के उद्यमी बाहर चले गये. लोगों का कहना है कि इस तरह धीरे धीरे रोजगार का सृजन करने वाली औद्योगिक इकाइयां बंद होती गयीं और रोजगार का संकट गहराता गया, जिससे पलायन का संकट बढ़ता चला गया. इस बार चुनाव में यहां के लोग प्रत्याशियों से इस मुतल्लिक दो टूक में बात करना चाहते हैं. वे जानना चाहते हैं कि पूर्णिया के औद्योगिक विकास में उनका योगदान क्यों नहीं रहा. चूंकि मुद्दा पुराना और गंभीर है, इसलिए अब महज वायदों और आश्वासनों से काम नहीं चलने वाला. पूर्णिया के मतदाता ठोस जवाब चाहते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ARUN KUMAR

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