पूर्णिया में राणीसती मंदिर में सजता है दादी मां का दिव्य दरबार, देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
राणी सती मंदिर पूर्णिया
Aaj Ka Darshan: पूर्णिया में 700 साल पुरानी आस्था, एक स्वप्न और फिर बना ऐसा धाम जहां पूरी होती हैं भक्तों की मुरादें.
पूर्णिया के कसबा से अक्षय कुमार की रिपोर्ट
Aaj Ka Darshan: पूर्णिया जिले के कसबा प्रखंड में स्थित राणीसती मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. दादी मां के इस प्रसिद्ध दरबार की ख्याति बिहार की सीमाओं से निकलकर देश और विदेश तक पहुंच चुकी है. यही कारण है कि हर दिन विभिन्न राज्यों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर माथा टेकते हैं और दादी मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.
भक्तों का विश्वास है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से दादी मां के चरणों में अपनी मनोकामना रखता है, उसकी मुराद अवश्य पूरी होती है. इसी अटूट आस्था ने राणीसती मंदिर को सीमांचल के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल कर दिया है.
साल में दो बार उमड़ता है आस्था का सैलाब
राणीसती मंदिर में हर वर्ष दो भव्य महोत्सवों का आयोजन किया जाता है. पहला भाद्रपद माह में आयोजित होने वाला भदवा महोत्सव और दूसरा माघ माह में मनाया जाने वाला मार्गशीर्ष महोत्सव. इन दोनों आयोजनों के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है. देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले भक्त कई दिनों तक यहां रुककर पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं.
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Aaj Ka Darshan: सुबह-शाम गूंजती है भव्य आरती
दादी मां के दरबार में प्रतिदिन सुबह और शाम भव्य आरती का आयोजन होता है. आरती के समय मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से भर उठता है. स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ दूर-दराज से आए भक्त भी आरती में शामिल होकर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं. लोगों का मानना है कि दादी मां की आरती में शामिल होने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि का संचार होता है.
एक स्वप्न से शुरू हुई मंदिर स्थापना की कहानी
मंदिर के इतिहास से जुड़ी मान्यता भी बेहद रोचक है. कहा जाता है कि राणीसती दादी मां लगभग 700 वर्ष पूर्व हरियाणा के मिमानी देवसर गांव में सती हुई थीं. वर्ष 2023 विक्रम संवत की भाद्रपद अमावस्या को बराकर निवासी झूनझूनवाला को स्वप्न में दादी मां ने आदेश दिया कि पूर्णिया जिले में उनका मंदिर स्थापित कर उनकी महिमा का प्रचार किया जाए.
इसके बाद संयोगवश उनकी मुलाकात कसबा के नंदलाल लाठ से हुई और मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ. वर्ष 1966 में मंदिर का शिलान्यास किया गया तथा 1968 में भव्य समारोह के बीच प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई.
मंदिर समिति संभालती है व्यवस्थाएं
राणीसती मंदिर के संचालन और रखरखाव के लिए एक समिति गठित है. मंदिर में होने वाले सभी धार्मिक और सामाजिक आयोजनों की जिम्मेदारी यही समिति निभाती है. मंदिर की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कसबा का प्रमुख चौक भी आज “राणीसती चौक” के नाम से जाना जाता है.
आज भी दादी मां का यह दरबार श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का ऐसा केंद्र बना हुआ है, जहां हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु अपनी आस्था की ज्योति जलाने पहुंचते हैं.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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