बिहार में पुलिस से पहले इस बाहुबली के पास पहुंच गया था AK47, यूपी से बंगाल तक चलता था सिक्का

Published by : Paritosh Shahi Updated At : 15 Jan 2025 2:58 PM

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बाहुबली अशोक सम्राट

Bahubali Ashok Samrat: बिहार में जुर्म की दुनिया में अशोक सम्राट ऐसा नाम था जिसने सबसे पहले 90 के दशक में एके-47 जैसे हथियार का इस्तेमाल किया था. बाहुबली अशोक सम्राट का साम्राज्य बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक फैला था. आइए उसकी पूरी कहानी बताते हैं…

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Bahubali Ashok Samrat: साल 1993 में जब गुप्तेश्वर पांडेय बेगूसराय के पुलिस अधीक्षक (SP) यानी कप्तान बनकर गए तो सबसे पहले उनकी नजर ऑफिस में लगे बिहार के मैप पर गई. जिस जिले में उनकी पोस्टिंग हुई है उसे लाल रंग से चिन्हित किया गया है. बचपन से ही हम पढ़ते आ रहे हैं कि लाल रंग यानी खतरे का निशान. लेकिन बेगूसराय को जिस खतरे की वजह से चिन्हित किया गया था उसका नाम था अशोक सम्राट. इसे बिहार का पहला बाहुबली कहा गया. आज हम इसी अशोक शर्मा उर्फ अशोक सम्राट की कहानी जानेंगे जिन्होंने बिहार में सबसे पहले AK47 का इस्तेमाल किया था.

अशोक सम्राट

अशोक सम्राट का शुरुआती जीवन

बेगूसराय के एक बेहद पढ़े लिखे परिवार में अशोक शर्मा का जन्म हुआ था. अशोक बचपन से ही पढ़ने-लिखने में काफी तेज थे. उन्होंने संस्कृत समेत दो सब्जेक्ट से पोस्ट ग्रेजुएट किया. उस वक्त बिहार में डबल एमए वालों की समाज में काफी इज्जत होती थी. उनकी पर्सनालिटी किसी हॉलीवुड अभिनेता जैसी थी. अशोक सम्राट के गांव वालों के मुताबिक वो 6 फुट लंबे थे. उनका सिलेक्शन दारोगा के लिए भी हुआ था लेकिन अपने दोस्त की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

अशोक शर्मा से अशोक सम्राट बनने की कहानी की शुरुआत

अशोक सम्राट दारोगा की नौकरी के लिए दरभंगा गए थे. यहां सबकुछ ठीक चल रहा था. इस दौरान एक दिन उन्हें खबर मिली की उनके सबसे अजीज दोस्त रामविलास चौधरी उर्फ मुखिया ने जहर खा लिया है. ये सुनते ही वह नौकरी छोड़कर दोस्त को बचाने गांव पहुंच गए और खुद को यह कहकर गोली मार ली कि जब मुखिया ही नहीं रहेगा तो वह जिंदा रहकर क्या करेंगे. इस घटना में अशोक सम्राट और मुखिया दोनों की जान बच गई. अशोक सम्राट के परिवार का झुकाव वामपंथ की ओर था लेकिन अशोक कांग्रेस पार्टी की विचारधारा से प्रभावित थे. बाद में वामपंथ के खिलाफ लड़ाई में रामविलास चौधरी उर्फ मुखिया अशोक सम्राट का दुश्मन बन गया. यहीं से अशोक शर्मा के अशोक सम्राट बनने की कहानी शुरू हुई.

अशोक सम्राट बना खौफ का दूसरा नाम

बिहार की राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे समझना है तो पहले बाहुबलियों को समझना पड़ता है. अशोक सम्राट, सूरजभान सिंह, अनंत सिंह, आनंद मोहन, मुन्ना शुक्ला जैसे बाहुबलियों का प्रभाव बिहार की राजनीति में लंबे वक्त तक रहा. लेकिन इन सब में सबसे पहले बिहार को अपने बाहुबल से खौफजदा किया उनका नाम अशोक सम्राट था. इनकी तूती बिहार, यूपी से लेकर पश्चिम बंगाल तक बोलती थी. अशोक सम्राट अपने दुश्मनों के खिलाफ जैसे हथियारों का इस्तेमाल करते थे बिहार पुलिस के अफसरों ने उस वक्त देखा तक नहीं था.

कैसे मिला AK47

अशोक सम्राट के पास AK47 कैसे पहुंचा इसे लेकर दो तरह की थ्योरी कही जाती है. पहली थ्योरी ये है कि यह रायफल अशोक सम्राट को खालिस्तानी आतंकियों ने बेगूसराय के रामदीरी गांव के मुन्ना सिंह के माध्यम से पहुंचाई और दूसरी थ्योरी ये है कि जिन आतंकियों को सेना ने पकड़ा था उनके पास वाला AK47 अशोक सम्राट के पास पहुंचा.

बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय

गुप्तेश्वर पांडेय अशोक सम्राट को कैसे याद करते हैं

एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में जब बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय से पूछा गया कि अशोक सम्राट को कैसे याद करते हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा, “जब 1993 में मैं बेगूसराय का कप्तान बना तो मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती अशोक सम्राट के खौफ को खत्म करने की थी. अब तो हर जिले में दो चार अपराधी हो गए हैं. लेकिन अशोक सम्राट का ऐसा जलवा था कि पूरे बिहार में अकेला अपराधी. उसकी तूती बोलती थी. उसकी सरकार चलती थी. बरौनी के सभी कारखानों पर, सभी ठेकेदारों पर, आसपास के सभी जिलों के रंगदारों पर उसका प्रभाव था. उसके एक इशारे पर सब उठ खड़ा हो जाते थे. सड़क बने, पुल बने या कोई भी काम हो, हर जगह उसका झंडा पताका लहराता रहता था. जो चाहेगा वही होगा, वही वहां का सरकार, वही वहां का प्रशासक, वही वहां का सीएम, वही वहां का डीएम, सब कुछ वही था. प्रशासन ने पूरी तरह सरेंडर कर दिया था.”

गुप्तेश्वर पांडेय के आवास के सामने मिला AK47

बेगूसराय के एसपी रह चुके गुप्तेश्वर पांडेय ने कई मौकों पर उस दौर को याद करते हुए कहा है, “अशोक सम्राट पूरे बिहार का सबसे बड़ा अपराधी था. वह कानून को कुछ नहीं समझता था. उसने अपने पीए मिनी नरेश की हत्या का बदला लेने के लिए मुजफ्फरपुर के छाता चौक पर दिनदहाड़े AK47 से बाहुबली चंद्रेश्वर सिंह को भून दिया था. एसपी रहते हुए मैंने सम्राट के खिलाफ बेगूसराय में 40 से ज्यादा छापेमारी की थी. जिसके बाद पुलिसिया दबिश से परेशान सम्राट के गुर्गे एक रात AK47 और 200 राउंड गोली एसपी आवास के आगे फेंक कर चले गए. साथ ही उसने एक चिट्ठी भी छोड़ी थी. जिसमें लिखा था आप इस हथियार के पीछे पड़े हैं ना. लीजिए में आपको ये खुद दे रहा हूं.”

बिना तस्वीर के कैसे हुआ अशोक सम्राट का एनकाउंटर

साल 1995 में सोनपुर में रेलवे का टेंडर निकला. पुलिस को सूचना मिली कि अशोक सम्राट हाजीपुर आने वाला है. तब यहां इंस्पेक्टर इंचार्ज के रूप में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट शशिभूषण शर्मा पोस्टेड थे. उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों को ड्यूटी पर लगाया. पुलिस के सामने सबसे बड़ी परेशानी अशोक सम्राट को पहचानने की थी. क्योंकि किसी के पास उसकी कोई तस्वीर नहीं थी. अशोक सम्राट की ताक में बैठी पुलिस की नजर एक गाड़ी में राइफल लेकर बैठे शख्स पर गयी. पुलिस ने अपनी जीप उस गाड़ी के सामने लगा दी. तभी अचानक उस गाड़ी से कुछ लोग निकले और पुलिस पर फायरिंग कर दी. पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की. दोनों तरफ से कई राउंड फायरिंग होने के बाद जब अपराधी भागने लगे तो गांव वालों ने भी अपराधियों को खदेड़ना शुरू किया. घंटों हुई गोलीबारी के बाद जब सब शांत हुआ तो पुलिस ने बाहुबली अशोक सम्राट के मौत की खबर दी. मौके से कई सौ राउंड गोलियां और AK-47 बरामद हुआ था. इस एनकाउंटर के बाद इंस्पेक्टर शशिभूषण शर्मा को प्रमोशन मिला और वो डीएसपी बनाये गए.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.

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