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बिहार में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया अब 74 दिनों में करनी होगी पूरी, लंबित होने पर सीओ को बताना होगा कारण

Updated at : 21 Dec 2022 3:41 AM (IST)
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बिहार में दाखिल-खारिज की प्रक्रिया अब 74 दिनों में करनी होगी पूरी, लंबित होने पर सीओ को बताना होगा कारण

नये भूमि सुधार अधिनियम के अनुसार म्यूटेशन, जमाबंदी व दाखिल-खारिज के मामले के निष्पादन के लिए सरकार ने एक समय सीमा 74 दिनों की बना दी है. लेकिन शायद ही कोई म्यूटेशन का आवेदन नियत समय सीमा के अंदर निष्पादित हो पाता है.

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सीवान. भू-राजस्व विभाग अब ऐसी व्यवस्था बना रहा है, जिसमें सीओ को यह बताना होगा कि उसके पास म्यूटेशन के लिए दिये गये आवेदन क्यों लंबित हैं? अगर किसी आवेदक ने 74 दिनों के अधिकतम सीमा तक दाखिल-खारिज प्रक्रिया नहीं पूरी होने पर शिकायत की तो उस आवेदन की जांच होगी कि किन-किन कारणों से उसका आवेदन लंबित है. अगर लंबित होने का उचित कारण होगा तब ही अधिकारियों की बात सुनी जायेगी, अन्यथा कार्रवाई की जायेगी.

राजस्व मामले में तीन स्तरीय कोर्ट की है व्यवस्था

भू-राजस्व समेत दाखिल-खारिज मामले के निष्पादन के लिए सीओ , भूमि सुधार समाहर्ता और अपर समाहर्ता, राजस्व के कोर्ट में सुनवाई की व्यवस्था रखी गई है. सबसे निचले स्तर पर अंचलाधिकारी के कोर्ट में म्यूटेशन के लिए आवेदन दिया जाता है. वहां मामला अगर नहीं निष्पादित हुआ तो उसे डीसीएलआर के कोर्ट में भेजा जाता है. वहां भी अगर मामले का निष्पादन नहीं हुआ तो आवेदक अपर समाहर्ता राजस्व के न्यायालय में मामले को रख सकता है. सरकार ने इसके लिए अंचलाधिकारी कोर्ट को 74 दिनों का समय दिया है ताकि किसी भी मामले की गहन जांच पड़ताल हल्का कर्मचारी से कराकर आवेदक के म्यूटेशन के आवेदन को स्वीकृति प्रदान करें. जब म्यूटेशन के आवेदन को स्वीकृति मिल जाती है तो उसे जमाबंदी कायम होना कहा जाता है. जमाबंदी कायम होने के बाद दाखिल-खारिज की अंतिम प्रक्रिया पूरी की जाती है.

सबसे ज्यादा मामले सीओ के पास ही लंबित होते हैं

सबसे ज्यादा मामले सीओ के पास ही लंबित होते हैं. इसके बाद डीसीएलआर के न्यायालय में, तब जिला स्थित अपर समाहर्ता के कोर्ट में. ज्ञात हो कि डीसीएलआर सीओ की रिपोर्ट के आधार पर ही अपना फैसला सुनाते हैं, जबकि अपर समाहर्ता को दोनों अधिकारियों के फैसलों की समीक्षा करके फैसला सुनाना होता है. नये भूमि सुधार अधिनियम के अनुसार म्यूटेशन, जमाबंदी व दाखिल-खारिज के मामले के निष्पादन के लिए सरकार ने एक समय सीमा 74 दिनों की बना दी है. लेकिन शायद ही कोई म्यूटेशन का आवेदन नियत समय सीमा के अंदर निष्पादित हो पाता है.

सीओ भी जांच के दायरे में रहेंगे

पिछले माह डीएम अमित कुमार पांडे द्वारा भगवानपुर अंचल कार्यालय की रैंडम जांच में यह सच निकलकर सामने आया था कि वहां एक ही गांव के एक दर्जन से ज्यादा आवेदन 19 माह से लंबित थे. इस मामले में डीएम ने एक राजस्व कर्मी को निलंबित और एक कंप्यूटर ऑपरेटर को राजस्व विभाग से हटाकर दूसरे विभाग में भेजने का आदेश जारी किया था. सीओ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी. अब नये आदेश में राजस्व कर्मी, म्यूटेशन करने वाला ऑपरेटर के साथ सीओ भी जांच के दायरे में रहेंगे.

बोले अपर समाहार्ता

सीवान राजस्व विभाग के अपर समाहर्ता जावेद अहसन अंसारी ने बताया कि मुख्य समस्या दाखिल-खारिज के लंबित मामलों को लेकर है. सीओ स्तर पर अगर नियमित रूप से मामलों को देखा जाये तो समय सीमा के अंदर निष्पादन संभव है. म्यूटेशन के लिए दिये गये आवेदन की स्वीकृति होने पर उसे जमाबंदी कायम होना कहा जाता है. उसके बाद दाखिल-खारिज की अंतिम प्रक्रिया पूरी होती है.

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