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अब आइजीआइएमएस में भी होगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट, अलग से तैयार होगा वार्ड

Updated at : 09 May 2025 1:11 AM (IST)
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अब आइजीआइएमएस में भी होगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट, अलग से तैयार होगा वार्ड

इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आइजीआइएमएस) में थैलेसीमिया से पीड़ित आने वाले मरीजों के लिए राहत भरी खबर है.

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-हीमैटोलॉजी विभाग के तहत मरीजों का होगा बोन मैरो ट्रांसप्लांट, संस्थान प्रशासन तैयारी में जुटासंवाददाता, पटनाइंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आइजीआइएमएस) में थैलेसीमिया से पीड़ित आने वाले मरीजों के लिए राहत भरी खबर है. संस्थान में आने वाले दिनों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जायेगा. इसके लिए संस्थान में अलग से वार्ड बनाया जायेगा. जिसका प्रस्ताव संस्थान विभाग की ओर से बना लिया गया है. यह इलाज हीमैटोलॉजी विभाग की ओर से किया जायेगा. इससे थैलेसीमिया मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है. आइजीआइएमएस के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ मनीष मंडल ने बताया कि आइजीआइएमएस में अभी किडनी और कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जा रहा है. इसी क्रम में अब संस्थान की ओर से बोन मैरो ट्रांसप्लांट और हार्ट ट्रांसप्लांट करने की योजना बनायी गयी है. अब यहां दूसरे व तीसरे चरण में इन सुविधाओं को शुरू कर दिया जायेगा.

अलग से तैयार होगा वार्ड, बड़ा केंद्र बनाने की तैयारी

संस्थान प्रशासन के अनुसार किडनी, लिवर और बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन के लिए एक केंद्र बनाने के प्रस्ताव को स्वास्थ्य विभाग से पहले ही मंजूरी मिल चुकी है. इसके लिए अलग से धनराशि की भी मंजूरी मिली है. हिमैटोलॉजी विभाग के तहत ट्रांसप्लांट की सुविधा मरीजों को मुहैया करायी जायेगी. आइजीआइएमएस के हिमैटोलॉजी विभाग में थैलेसीमिया मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट होगा. इसकी तैयारी अब जल्द ही शुरू होने जा रही है. संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार सेंटर बनने के बाद शुरुआत मरीज के बहन या भाई से बौन मैरो लेकर प्रत्यारोपित किया जायेगा. इसके बाद धीरे-धीरे दूसरे मरीजों की सुविधा बहाल होगी.

मरीजों को समय-समय पर चढ़ाया जाता है खून

डॉ मनीष मंडल व आइजीआइसी के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ एनके अग्रवाल ने बताया कि थैलेसमिया एक स्थायी आनुवांशिक रक्त विकार है, जिससे लाल रक्त कणों में हीमोग्लोबिन नहीं बनता है. मरीज एनीमिया की चपेट में आ जाता है. जान बचाने के लिए मरीज का समय-समय पर खून चढ़ाया जाता है. लाल रक्त कोशिकाओं की कमी से शरीर को कम ऑक्सीजन मिलती है, जिससे थकान और कमजोरी होती है. हीमोग्लोबिन की कमी से मरीज का शरीर पीलापन का शिकार हो जाता है. तीन से चार फीसदी माता-पिता इसके वाहक हैं. देश में हर साल 10 से 15 हजार बच्चे थैलेसीमिया की गंभीर बीमारी के साथ जन्म ले रहे हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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KUMAR PRABHAT

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By KUMAR PRABHAT

KUMAR PRABHAT is a contributor at Prabhat Khabar.

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