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चिराग पासवान बनाम पशुपति कुमार पारस की लड़ाई में लोजपा का असली वारिस कौन?

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
चिरााग पासवान व पशुपति पारस
चिरााग पासवान व पशुपति पारस
फाइल

पटना. बिहार की राजनीति में सियासी संघर्ष का सिलसिला जारी है. लुटियंस दिल्ली के बंगलों में एलजेपी नेताओं के बीच पड़ी फूट के बाद लोक जनशक्ति पार्टी पर कब्जा किसका होगा, इसपर दिल्ली हाईकोर्ट में आज सुनवाई होगी. दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस रेखा पल्ली की बेंच मामले की सुनवाई करेगी. चिराग पासवान ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी है. लोकसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चिराग ने चुनौती दी है जिसमें उन्होंने चाचा पशुपति कुमार पारस की अगुवाई वाले गुट को सदन में मान्यता दी है.

चिराग की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल अर्जी में कहा है कि पार्टी विरोधी गतिविधि और शीर्ष नेतृत्व को धोखा देने के कारण उनको लोक जनशक्ति पार्टी ने पशुपति कुमार पारस को पहले ही पार्टी से निकाल दिया था. इसके साथ ही कहा है कि सांसद पारस लोजपा के सदस्य नहीं हैं. लोजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुल 75 सदस्य हैं और इनमें से 66 सदस्य हमारे (चिराग गुट) साथ हैं और सभी ने हलफनामा दिया है.

पार्टी किसकी - कैसे होगा फ़ैसला?

यह पहला अवसर नहीं है जब राजनीतिक विरासत के लिए परिवार के लोग एक दूसरे के सामने आए हों. चिराग पासवान बनाम पशुपति कुमार पारस मामले में किसका पलड़ा भारी है? इसपर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एसवाई क़ुरैशी ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि जब कोई पार्टी दो हिस्सों में बंट जाती है, तब दोनों गुट चुनाव आयोग के पास जाते हैं. इसके बाद वे अपने को बहुमत में होने का दावा करते हैं. ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग दोनों पक्षों को बुलाकर मामले की सुनवाई करता है और आयोग सबूत देखता है. इसके साथ विधायकों और सांसदों की गिनती की जाती है. ये देखा जाता है कि बहुमत किस ओर है. पार्टी के ऑफिस बियरर्स में बहुमत किधर है. इसके बाद जिसके पास बहुमत होता है, उसी गुट को पार्टी माना जाता है. बिहार विधानसभा या विधान परिषद में लोक जनशक्ति पार्टी के पास एक भी सदस्य नहीं है. हालांकि, लोकसभा में पार्टी के पास छह सांसद हैं जिनमें से पाँच पारस गुट में हैं. ऐसे में संख्या बल के लिहाज़ से पारस गुट मज़बूत स्थिति में नज़र आ रहा है.

पार्टी का संविधान कितना अहम?

चिराग पासवान लगातार यह दावा कर रहा है कि लोक जनशक्ति पार्टी का संविधान उनके पक्ष में है. इसपर डॉ. एसवाई क़ुरैशी कहते हैं, भारत के संविधान में राजनीतिक पार्टी का ज़िक्र ही नहीं है. ऐसे में जब एसपी सिंह वर्मा तीसरे मुख्य चुनाव आयुक्त बने, फिर साल 1967 के बाद ये समस्या शुरू हुई कि पार्टियां टूट सकती हैं. ऐसे में उन्होंने एक चुनाव चिह्न आदेश तैयार किया जिसे ‘सिंबल्स ऑर्डर 1968’ के रुप में जानते हैं. "यही आदेश अभी तक चल रहा है. इसे किसी क़ानून में नहीं बदला गया है. इस आदेश में सब कुछ स्पष्ट है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकार किया है. आदेश का पैरा 16 कहता है कि किसी भी पार्टी के विभाजन में तीन चीज़ें महत्वपूर्ण हैं. पहला चुने हुए प्रतिनिधि किस तरफ हैं, दूसरे ऑफिस बियरर्स किस तरफ हैं, और तीसरी संपत्तियां किस तरफ हैं. लेकिन किस धड़े को पार्टी माना जाए इसका फैसला सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधियों के बहुमत के आधार पर होता है. जिस तरफ चुने हुए प्रतिनिधि होंगे, वही पार्टी होगी. इस लिहाज से पारस गुट का कब्जा ज्यादा महत्वपूर्ण दिखता है.

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