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Independence Day : जानिए 1906 से 1947 तक कैसे बढ़ी राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा

Updated at : 15 Aug 2022 6:00 AM (IST)
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Independence Day : जानिए 1906 से 1947 तक कैसे बढ़ी राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा

प्रत्येक स्वतंत्र देश का अपना एक राष्ट्रीय ध्वज होता है, जो उसकी राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण अंग होता है. यह ध्वज राष्ट्र के स्वतंत्र और गौरव का प्रतीक होता है. वैसे ही तिरंगा हमारा यही गौरव है. कैसे आगे बढ़ी तिरंगे की विकास यात्रा समेत राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ी तमाम जानकारियों के लिए पढे ये खबर

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इस वर्ष 15 अगस्त को देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस अमृत काल को देश ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के रूप में मना रहा है. इस महोत्सव को अविस्मरणीय बनाने के लिए संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की शुरुआत की है. जिसका उद्देश्य देश की आन, बान और शान तिरंगा के प्रति लोगों के हृदय में गौरव व सम्मान की भावना जगाने के साथ ही राष्ट्र भक्ति की अलख भी जगाना है.

परिवर्तनों से गुजर कर हमारे राष्ट्रीय ध्वज को यह स्वरूप मिला

प्रत्येक स्वतंत्र देश का अपना एक राष्ट्रीय ध्वज होता है, जो उसकी राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण अंग होता है. यह ध्वज राष्ट्र के स्वतंत्र होने का प्रतीक भी है और राष्ट्र के गौरव का प्रतीक भी. तिरंगा हमारा यही गौरव है. अनेक परिवर्तनों से गुजर कर हमारे राष्ट्रीय ध्वज को यह स्वरूप मिला है. हमारे ध्वज का जो वर्तमान स्वरूप है, वहां तक पहुंचने के लिए उसे लंबी यात्रा तय करनी पड़ी है. बीसवीं शताब्दी में जब देश ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था, तब स्वतंत्रता सेनानियों को एक ध्वज की आवश्यकता महसूस हुई.

1904 में विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने पहली बार एक ध्वज बनाया

वर्ष 1904 में विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने पहली बार एक ध्वज बनाया, जो लाल और पीले रंग का था. इसे बाद में सिस्टर निवेदिता ध्वज के नाम से जाना गया. तीन रंगों वाला ध्वज पहली बार 1906 में बंगाल के बंटवारे के विरोध में निकाले गये जुलूस में सामने आया. इस ध्वज को शचींद्र कुमार बोस लेकर आये थे. इसमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में पीला और सबसे नीचे हरे रंग का प्रयोग किया गया था. केसरिया रंग पर सफेद रंग में आठ अधखिले कमल के फूल बने थे. नीचे हरे रंग की पट्टी पर सूर्य और चंद्रमा बना था. बीच की पीले रंग की पट्टी पर हिंदी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था.

भीकाजी कामा ने भी जर्मनी में एक तिरंगा फहराया था

वर्ष 1908 में भीकाजी कामा ने भी जर्मनी में एक तिरंगा फहराया था. इस ध्वज में सबसे ऊपर हरा, बीच में केसरिया और सबसे नीचे लाल रंग था. इस झंडे में भी देवनागरी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था और सबसे ऊपर आठ कमल के फूल बने थे. ध्वज को भीकाजी कामा, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने तैयार किया था. प्रथम विश्व युद्ध के समय इसे ‘बर्लिन कमेटी ध्वज’ के नाम से जाना गया, क्योंकि इसे बर्लिन कमेटी में भारतीय क्रांतिकारियों ने अपनाया था.

पहला ध्वज : 1906

वर्ष 1906 में पहली बार भारत का गैर आधिकारिक ध्वज फहराया गया. इस ध्वज को 7 अगस्त, 1906 को ‘बंगाल विभाजन’ के विरोध में पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था. यह हरे, पीले और लाल रंग की क्षैतिज पट्टियों से बना था. ऊपर की ओर लगी हरी पट्टी में सफेद रंग के आठ अधखिले कमल के फूल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चांद बने हुए थे. जबकि मध्य की पीली पट्टी में देवनागरी पर ‘वंदे मातरम्’ लिखा था.

दूसरा ध्वज : 1907

भारत के दूसरे ध्वज को 1907 में पेरिस में भीकाजी कामा और उनके साथ निर्वासित किये गये कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था. कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार, यह ध्वजारोहण 1905 में हुआ था. कुछ अंतर को छोड़ दें, तो यह ध्वज पहले ध्वज के समान ही था. इसमें सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में पीले और नीचे हरे रंग की पट्टी थी. केसरिया पट्टी पर सात तारे बने थे जो सप्तऋषि का प्रतीक थे. मध्य की पीले रंग की पट्टी पर देवनागरी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा था. नीचे की हरी पट्टी पर सूरज और चांद अंकित थे. यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था.

तीसरा ध्वज : 1917

वर्ष 1917 में भारतीय राजनीतिक संघर्ष के निश्चित मोड़ लेने के बाद डॉ एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने होमरूल आंदोलन के दौरान जो ध्वज फहराया था वह पूर्व के ध्वज से बिल्कुल भिन्न था. इस ध्वज में पांच लाल और चार हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक के क्रम में स्थित थीं. इन पट्टियों पर सप्तऋषि के स्वरूप को दर्शाते सात सितारे और ऊपर दायीं ओर एक कोने में एकता दिखाने के लिए अर्धचंद्र व तारे भी अंकित थे. ध्वज के बायीं ओर के ऊपरी किनारे पर यूनियन जैक भी बना था.

चौथा ध्वज : 1921

वर्ष 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान इस ध्वज को गैर आधिकारिक रूप से अपनाया गया. इस सत्र के दौरान आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बना कर गांधी जी को दिया. यह झंडा लाल और हरे रंग का बना था, जो हिंदू और मुसलमान का प्रतिनिधित्व करता था. गांधी जी के सुझाव पर भारत के शेष समुदायों का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद रंग की पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा भी दर्शाया गया.

ध्वज का यादगार वर्ष : 1931

वर्ष 1931 भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा का एक यादगार वर्ष है. इस वर्ष तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद और नीचे हरे रंग की पट्टी थी. ध्वज के मध्य की सफेद पट्टी में चलता हुआ चरखा था. यह ध्वज भारतीय राष्ट्रीय सेना का संग्राम चिह्न भी था.

वर्तमान तिरंगे का स्वरूप : 1947

वर्ष 1947 के 22 जुलाई को पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार राष्ट्रीय ध्वज को संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज माना. तीन रंग केसरिया, सफेद और हरा तथा अशोक चक्र वाला यह तिरंगा ही हमारा वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज है.

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