Bihar Election 2020 : बड़े नेताओं के बेटों से आशंकित हैं कार्यकर्ता

Updated at : 28 Jun 2020 6:56 AM (IST)
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Bihar Election 2020 : बड़े नेताओं के बेटों से आशंकित हैं कार्यकर्ता

Bihar Election 2020 बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है. वर्षों से कांग्रेस का झंडा उठानेवाले कार्यकर्ताओं को चुनाव के समय मौका भी नहीं मिलता.

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पटना : बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है. वर्षों से कांग्रेस का झंडा उठानेवाले कार्यकर्ताओं को चुनाव के समय मौका भी नहीं मिलता. इस बार के विधानसभा चुनाव में कार्यकर्ताओं को आशंका है कि महागठबंधन के तहत सीमित संख्या में सीटें मिलेंगी, वह पार्टी के बड़े नेताओं के पुत्रों के खाते में नहीं चली जाये. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की नयी पीढ़ी चुनाव के लिए तैयार हो चुकी है. ऐसे नेताओं के पुत्र वसीयत संभालने के लिए तैयार हैं. विधान परिषद की एक सीट के लिए उम्मीदवार बनाये गये डाॅ समीर कुमार सिंह के पिता भी राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं.

विरासत सौंपने की हो रही है तैयारी

विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अंदर कई तरह की चर्चा चल रही है. पार्टी के जितने भी बड़े चेहरे हैं वे रिटायरमेंट के करीब हैं. अक्तूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के माध्यम से ऐसे नेता अपने पुत्रों को सक्रिय राजनीति में प्रवेश कराने की तैयारी में हैं. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस में ऐसा प्रयोग हो चुका है. सहयोगी दल रालोसपा की टिकट पर कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य डाॅ अखिलेश प्रसाद सिंह ने अपने पुत्र को उम्मीदवार बनाने में सफलता पायी थी.

कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह के बेटे टाटा ग्रुप की अच्छी नौकरी छोड़ समाज सेवा में उतर आये हैं. प्रदेश अध्यक्ष डाॅ मदन मोहन झा के पिता नागेंद्र झा की गिनती कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में होती थी. अब डाॅ झा के बेटे का रूझान भी पार्टी की सक्रिय राजनीति में है. कांग्रेस के दलित चेहरे डाॅ अशोक कुमार, पूर्व मंत्री अवधेश कुमार सिंह और विजय शंकर दुबे के बेटे भी राजनीति में एक्टिव हैं. इनके अलावा पूर्व राज्यपाल निखिल कुमार के भतीजे और पूर्व मंत्री श्याम सुंदर सिंह धीरज के पुत्र भी विरासत संभालने को तैयार हैं.

2015 के विस चुनाव में पार्टी को 41 सीटें मिलीं

कांग्रेस कार्यकर्ताओं की दूसरी और सबसे बड़ी चिंता बाहरी नेताओं को दिया जानेवाला टिकट है. 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मात्र 41 सीटें मिलीं. इसमें निर्वाचित होनेवाले 27 में से चार विधायक तो कभी पार्टी मुख्यालय की ओर रूख ही नहीं किया.

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