बिहार का 15000 करोड़ का कोचिंग साम्राज्य, कैश में वसूली, टैक्स चोरी और एजेंटों का खेल
Prabhat Khabar Investigation: बिहार में 15000 करोड़ का कोचिंग कारोबार टैक्स चोरी, नकद वसूली और कमीशन एजेंटों के जाल पर चल रहा है. पटना के मुसल्लहपुर हाट से लेकर बड़े सेंटरों तक, नीट-जेईई और बीपीएससी के छात्रों पर 20000 तक की कट मनी बंटती है. रिजल्ट आते ही सफल छात्रों की ऊंची बोली लगाई जाती है.
अनिकेत, सुबोध, अनुराग, अंबर और अमृता
Prabhat Khabar Investigation: जेठ की तपती दुपहरिया में मुसल्लहपुर हाट की संकरी कोचिंग गली पसीने से तर-बतर छात्रों की भीड़ से पटी है. कभी फल-सब्जी के आढ़त के लिए मशहूर यह इलाका अब अरबों रुपये के कोचिंग साम्राज्य में बदल चुका है. बहुमंजिले इमारतों पर टंगे बड़े-बड़े होर्डिंग्स छात्रों को सरकारी नौकरी के सपने बेच रहे हैं. पूछताछ काउंटरों पर कर्मचारी मनोवैज्ञानिक खेल खेलते हैं- ‘अभी एडमिशन नहीं लिया तो कोर्स छूट जायेगा, आज दाखिला लेने पर 20 से 50 प्रतिशत तक डिस्काउंट है.
एक ही बैच में पढ़ने वाले किसी छात्र से 6500 तो किसी से मोलभाव के आधार पर 4000 वसूले जा रहे हैं. छात्रों को संस्थान तक खींचने के लिए हॉस्टलों और चाय-पान की दुकानों पर बकायदा कमीशन एजेंटों का नेटवर्क सक्रिय है. बीपीएससी के लिए 2000, वन-डे परीक्षाओं के लिए 500 और नीट-जेईई जैसे महंगे कोर्स में सीधे कुल फीस का 10 प्रतिशत (10,000 से 20,000) कर्मचारियों और एजेंटों में बंटता है.
एक्सपर्ट से जानिए, ऐसे चलता है बिहार का 15000 करोड़ का कोचिंग कारोबार
एक्सपर्ट 1 : राजेश खेतान, (सीए)
निगरानी से बचने के लिए धड़ल्ले से नकद फीस वसूली
विशाल नेटवर्क : निजी सर्वेक्षणों और ‘स्मार्ट स्क्रेपर्स’ के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 6,383 कोचिंग संस्थान चल रहे हैं. इनमें अकेले पटना में 1,256, मुजफ्फरपुर में 578 और गया में 428 संस्थान हैं. अगर प्रति संस्थान औसतन 300-600 विद्यार्थियों तथा बड़े संस्थानों में 2,500 से 4,000 विद्यार्थियों के नामांकन को आधार माना जाए, तो यह करीब 15000 करोड़ का बिजनेस है.
राजस्व को नुकसान : अगर इस 15,000 करोड़ से अधिक के सालाना उद्योग का केवल 10 प्रतिशत कारोबार भी कर प्रणाली से बाहर रहता है, तो संभावित राजस्व प्रभाव 6,150 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है.
टैक्स चोरी के हथकंडे: कोचिंग सेवाएं 18 प्रतिशत जीएसटी के दायरे में आती हैं. टैक्स से बचने के लिए कई संस्थान ट्यूशन फीस, स्टडी मटेरियल, टेस्ट सीरीज और किताबों की बिक्री को अलग-अलग फर्जी फर्मों और फ्रेंचाइजी मॉडल में बांटकर दिखाते हैं. निगरानी से बचने के लिए धड़ल्ले से नकद फीस वसूली और अनियमित लेखांकन का सहारा लिया जाता है.
एक्सपर्ट 2 : अमित कुमार, (फिजिकल ट्रेनर)
आइडी कार्ड का खेल, रिजल्ट के बाद पैसों की खुली बोली
फर्जी क्लेम का आधार : पटना में सिपाही व दारोगा भर्ती के लगभग 35 फिजिकल ट्रेनिंग सेंटर चलते हैं, जहां 17 से 18 हजार छात्र ट्रेनिंग लेते हैं. इनमें से करीब 9,000 से अधिक छात्र एक से अधिक कोचिंग संस्थानों के संपर्क में रहते हैं. कोचिंग संस्थान विभिन्न फिजिकल एकेडमी से टाइअप कर अपने स्टूडेंट को वहां भेजते हैं. कोचिंग संस्थान के स्टूडेंट को वहां की आईडी भी बनाकर दी जाती है.
रिजल्ट के बाद सिंडिकेट : जब छात्र फाइनल रिजल्ट में सफल हो जाता है, तो लिखित परीक्षा कराने वाली कोचिंगें इन्हीं आई-कार्डों को आधार बनाकर छात्र पर अपना दावा ठोक देती हैं.
गिफ्ट और कैश का खेल : जो छात्र स्वतंत्र रूप से ट्रेनिंग लेते हैं, उनके चयन के बाद कोचिंग संचालक सीधे फिजिकल ट्रेनर्स से संपर्क करते हैं. चयनित अभ्यर्थियों को अपने संस्थान का दिखाने के लिए पैसे और महंगे गिफ्ट का बड़ा खेल परदे के पीछे चलता है. सफल छात्र को अपने कोचिंग सेंटर का बताने के लिए लाखों रुपये खर्च किये जाते हैं.
एक्सपर्ट 3 : गुरु रहमान, प्रसिद्ध शिक्षक
‘सेटिंग’ का झूठा दावा और आंकड़ों की बाजीगरी
छात्रों को फंसाने का जाल : कुछ कोचिंग संचालक दारोगा भर्ती सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘सेटिंग’ का दावा कर छात्रों और अभिभावकों का आर्थिक शोषण करते हैं. नौकरी के नाम पर भारी वित्तीय अनियमितताएं की जा रही हैं. पूर्व में संस्थानों के बीच पोस्टर लगाने की प्रतिस्पर्धा में गोलीबारी और हिंसक झड़पें भी हो चुकी हैं.
आंकड़ों का खेल : सिपाही भर्ती में एक कोचिंग संस्थान ने 12,000 और दूसरे ने 10,000 छात्रों के सफल होने का दावा किया. दोनों के दावे मिलाकर 22,000 हो गये, जबकि कुल पद 19,838 ही थे.
फिजिकल का सच : सिपाही भर्ती में लिखित परीक्षा सिर्फ 30 प्रतिशत अंकों के साथ क्वालिफाइंग होती है, जबकि मेरिट लिस्ट 100 अंकों के फिजिकल टेस्ट पर बनती है. कोचिंग संस्थान वाले मुख्य शिक्षक फिजिकल ट्रेनर नहीं होते, बल्कि गांधी मैदान में सक्रिय ट्रेनर्स को कमीशन देकर सेट रखते हैं और रिजल्ट आने पर पूरा श्रेय खुद ले लेते हैं.
एक्सपर्ट 4 : अभयानंद, पूर्व डीजीपी
2010 का कोचिंग एक्ट सख्ती से लागू हो
कोचिंग सिर्फ माध्यम है : सफलता का केवल एक माध्यम हो सकती है, लेकिन सफलता की असली नींव छात्र की मेहनत, अनुशासन और स्वयं की समझ पर ही टिकी होती है. स्वयं पढ़ाई करना सबसे बेहतर तरीका है.
विवादों से दूरी जरूरी : शिक्षकों को अपने तमाम आपसी मतभेद भुलाकर केवल छात्रों की पढ़ाई और उनके आगामी भविष्य को ही अपनी मुख्य प्राथमिकता बनाना चाहिए. शिक्षकों के आपसी विवादों का असर छात्रों पर नहीं पड़ना चाहिए. वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाएं जिससे छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़े.
गुणवत्ता देख चुनें संस्थान : वर्ष 2009-10 के कोचिंग एक्ट को धरातल पर सख्ती से लागू करने की जरूरत है, जिससे संस्थानों में छात्रों के लिए जवाबदेही, बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित माहौल बढ़े. अत्यधिक भीड़भाड़ वाले माहौल में अच्छी पढ़ाई और शंकाओं का समाधान संभव नहीं है. बेहतर शिक्षा के लिए क्लास में सीमित छात्र और सीधा संवाद जरूरी है.
एजेंट का कमीशन
एक कोचिंग संस्थान में छात्रों का एडमिशन कराने वाले एजेंट को मोटा कमीशन, नीट-जेईई में प्रति छात्र ~20,000 तक का कट मनी.
टैक्स की चोरी
टैक्स से बचने के लिए कई संस्थान एडमिशन के लिए कैश ही लेते हैं.
सफलता की बोली
अगर कोई छात्र सफल होता है, तो उस पर एक से अधिक संस्थान अपना दावा करते हैं और ब्रांडिंग के लिए लाखों रुपयों की बोली लगती है.
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लेखक के बारे में
By Paritosh Shahi
परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.
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