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Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव का पढ़ें इतिहास, शुरू से लेकर अब तक की कहानी, कौन-कौन बने मुख्यमंत्री

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
बिहार विधानसभा
बिहार विधानसभा
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Bihar Vidhan Sabha Election, Bihar Election 2020, Bihar assembly History: कोरोना काल के साए के बीच बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. एनडीए और महागठबंधन में टिकट बंटवारे को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ी हुई है. 28 अक्टूबर को होने वाले पहले चरण के मतदान के लिए आज से नामांकन का दौर शुरू हो गया है. जदयू और बीजेपी गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापसी करने की कोशिश में लगा है. वहीं, बिहार पर 15 साल राज करने वाली लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी सत्ता में वापसी करने की पूरी कोशिश में लगी है.

लालू के बेटे तेजस्वी यादव सीएम नीतीश कुमार के सामने खुद को सीएम पद चेहरा पेश कर रहे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव बेहद ही दिलचस्प होता है. बिहार चुनाव पर पूरे देश की नजरें होती हैं. सदी के अंतिम साल, यानी 15 नवंबर 2000 को बिहार का विभाजन हुआ और झारखंड अस्तित्व में आया. विधानसभा की सीटें 324 से घटकर 243 हो गयीं. चलिए आपको बताते हैं बिहार विधानसभा चुनाव के इतिहास के बारे में. कब से विधानसभा के चुनाव शुरू हुए. साथ ही कितनी बार विधानसभा का चुनाव अब तक हो चुका हैं.

1937 में बिहार विधान सभा का गठन

बिहार विधान सभा का गठन 1937 में हुआ था. उस काउंसिल के पहले चेयरमैन सच्चिदानंद सिन्हा थे. पहले स्पीकर हम दयालु सिंह चुने गए थे. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के व्यवस्थाओं के अनुसार जनवरी 1937 की अवधि में बिहार विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए. 20 जुलाई 1937 को डॉ श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पहली सरकार का गठन हुआ था. 22 जुलाई में से 30 को विधानमंडल का अधिवेशन हुआ. 1952 में बिहार विधानसभा का पहली बार चुनाव हुआ था. जिसमें कांग्रेस सत्ता में आई. श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने और डॉ अनुग्रह नारायण सिन्हा राज्य के पहले उप मुख्यमंत्री बने.

1957 से 1977 तक कांग्रेस राज

25 फरवरी 1957 को बिहार विधानसभा के चुनाव का दूसरी बार चुनाव हुआ. विधानसभा में 264 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 1393 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था. एक बार फिर कांग्रेस ने बिहार में सरकार बनाई. 1962 में फिर कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी. पंडित बिनोदानंद झा ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. 1969 के चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और हरिहर सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इस चुनाव में तीन दलों ने 'ट्रिपल एलायंस' में चुनाव लड़ा.

लोकतांत्रिक कांग्रेस दल, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्ता सोशलिस्ट पार्टी. बिहार विधान सभा चुनाव 1972 में फिर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और केदार पांडे ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. 19 मार्च 1972- 02 जुलाई 1973 तक. जिसके बाद अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973-11 अप्रैल 1975 तक बिहार के सीएम रहे. जिसके बाद जगन्नाथ मिश्रा ने 11 अप्रैल 1975-30 अप्रैल 1977 बिहार के मुख्यमंत्री बने. यह वो दौर था जब कांग्रेस बिहार में अपने चरम पर थी.

इमरजेंसी के बाद बदल गई सरकार

1977 के बिहार विधान चुनाव में जनता पार्टी ने जीत दर्ज की. सीएम के पद की शपथ कर्पूरी ठाकुर ने ली. यह वह वक्त था जब देश में इमरजंसी के बाद पहली बार चुनाव हो रहे थे. इस चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार मिली थी. बिहार विधान सभा 1980 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, और जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. कुछ ही दिन बाद कांग्रेस में सियासी उठापठक के बाद बिहार में कांग्रेस ने सीएम को बदल दिया. चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने. फिर 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 323 उम्मीदवार खड़े किए उनमें से 196 जीते.

बिहार में लालू यग की शुरूआत

1990 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए और उसमें कांग्रेस निचले पायदान पर थी. उसे महज 71 सीटें हासिल हुईं. जनता दल 122 विधायकों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने था. 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की सरकार रही. लगभग एक ही सामाजिक समीकरण पर किसी सरकार का डेढ़ दशक तक सत्ता में बने रहना दूसरी परिघटना थी.

पशुपालन घोटाला सामने आने के बाद लालू यादव ने पांच जुलाई 1997 के राष्ट्रीय जनता दल नाम से नयी पार्टी बना ली. उधर, अदालत की निगरानी में सीबीआइ जांच तेजी से चल रही थी. लालू प्रसाद को उसने आरोपी बना दिया. ऐसे में लालू को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा. उनकी जगह राजद विधायकों ने उनकी पत्नी राबड़ी देवी को विधायक दल का नया नेता चुन लिया. इस तरह राबड़ी देवी बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं.

लालू राज का अंत, सुशासन राज की शुरुआत

2005 के विधानसभा चुनाव में राजद की सीटें घटकर 88 पर पहुंच गयी और वह सरकार से बाहर हो गया. जदयू और बीजेपी की अगुआई में नये सामाजिक आधार वाले गठबंधन की सरकार सत्ता में पहुंची. साल 2005 बिहार की राजनीति के लिए अहम वर्ष रहा. 15 साल के राजद शासन के बाद बिहार की राजनीति ने करवट ली. एक साल में दो बार विधानसभा चुनाव कराए गए. विभाजित बिहार में सुशासन और विकास राजनीति का मुख्य मुद्दा बना.

सत्ता की कमान नीतीश कुमार को संभालने का मौका मिला. बिहार में 243 विधानसभा सीट के लिए फरवरी 2005 में हुए चुनाव में किसी दल को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं मिला. फिर अक्टूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू और बीजेपी गठबंधन को भारी सफलता मिली. राजद को जहां 75 सीटें मिली थी. वहीं अक्टूबर में यह घटकर 54 हो गयी. जदयू को 55 की जगह 88 और बीजेपी को 37 के स्थान पर 55 सीटें मिली. इस तरह से बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन राज की शुरूआत हुई.

2010 में फिर सुशासन सरकार

साल 2005 में नीतीश की जनता दल यूनाइटेड ने जहां 88 सीटें जीती थीं, वहीं 2010 के चुनाव में 115 सीटों पर कब्‍जा किया. बीजेपी ने 55 के आंकड़े से छलांग लगाते हुए 91 सीटों पर विजय हासिल की. नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बने.

मोदी लहर के खिलाफ उतरे नीतीश कुमार

2014 लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में पहली बार चुनाव हो रहा था. देश में मोदी लहर थी. जेडयू और बीजेपी पहली बार बिहार में विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ रहे थे. बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन बनाया और हैट्रिक लगाई. महागठबंधन ने 178 सीटें अपने नाम की. सरकार बनाई, लेकिन कुछ महीनों बाद नीतीश कुमार दोबार बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाई और आरजेडी से अलग हो गए. इस दौरान कुछ दिनों के लिए नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था.

Posted By: utpal kant

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