चुनाव आ गया पर नहीं मिल पाया विधानसभा को उपाध्यक्ष

Updated at : 11 Feb 2020 4:20 AM (IST)
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चुनाव आ गया पर नहीं मिल पाया विधानसभा को उपाध्यक्ष

मिथिलेश, पटना : 16 वीं बिहार विधानसभा के कार्यकाल पूरे होने को है, पर संभवत: पहली बार किसी विधानसभा के पूरे पांच वर्षों के कार्यकाल में उपाध्यक्ष का चयन नहीं हो पायेगा. विधानसभा में उपाध्यक्ष व विधान परिषद में उपसभापति के मनोनयन या चुनाव की परंपरा रही है. इसके पहले भी राज्य के सभी विधानसभा […]

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मिथिलेश, पटना : 16 वीं बिहार विधानसभा के कार्यकाल पूरे होने को है, पर संभवत: पहली बार किसी विधानसभा के पूरे पांच वर्षों के कार्यकाल में उपाध्यक्ष का चयन नहीं हो पायेगा. विधानसभा में उपाध्यक्ष व विधान परिषद में उपसभापति के मनोनयन या चुनाव की परंपरा रही है. इसके पहले भी राज्य के सभी विधानसभा में उपाध्यक्ष मनोनीत हुए हैं. किसी ने पूरे पांच वर्षों अपना कार्यकाल पूरा किया तो कई के पद कुछ ही दिन के रहे.

भाजपा के अमरेंद्र प्रताप सिंह, भोला सिंह व पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी इनसे भी पहले रघुवंश प्रसाद सिंह, शिवनंदन पासवान, गजेंद्र प्रसाद हिमांशु, जगबंधु अधिकारी और झारखंड के देवेंद्र नाथ चंपिया जैसे नेता बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष हुए हैं. अंतिम उपाध्यक्ष भाजपा के नेता अमरेंद्र प्रताप सिंह हुए. 16वीं विधानसभा के अब चंद महीने बाकी रह गये हैं. 24 फरवरी से बजट सत्र आरंभ होने वाला है.
इसके बाद माॅनसून सत्र होगा. अगस्त के बाद किसी भी दिन विधानसभा चुनाव की घाेषणा हो सकती है. 16 वीं विधानसभा में दो बार सरकारें बनीं. पहली सरकार जदयू, राजद और कांग्रेस के साथ बनी. जदयू के वरिष्ठ नेता विजय कुमार चौधरी स्पीकर बनाये गये. 2017 में सरकार का समीकरण बदल गया. जदयू और भाजपा की संयुक्त सरकार गठित हुई.
अब विपक्ष में राजद और कांग्रेस के बैठने की बारी आयी. जुलाई, 2017 से यह सरकार चल रही है. जानकार बताते हैं कि इस दौरान विधानसभा उपाध्यक्ष के पद पर मनोनयन या चुनाव को लेकर ना तो विपक्ष की आेर से दावा किया गया और न ही सत्ता पक्ष की ओर से ऐसी कोई पहल हुई.
कार्यकारी सभापति प्रो हारूण रशीद का कार्यकाल छह मई को हो रहा खत्म
क्या है प्रावधान
संसदीय परंपराओं के जानकारों के मुताबिक विधानसभा के उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को दिये जाने की परंपरा रही है, पर ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है. पक्ष-विपक्ष के आपसी समन्वय से ऐसा हो सकता है, लेकिन जब चुनाव की नौबत आयेगी तो सत्ताधरी दल के पास ही यह पद रहेगा.
विधान परिषद को मिलेगा नया सभापति या फिर होगा कार्यकारी सभापति का मनोनयन
विधान परिषद को इस साल नया सभापति मिल सकता है. विधान परिषद में सभापति का पद अभी खाली है. छह मई को कार्यकारी सभापति का भी पद खाली हो जायेगा. सभापति का चुनाव नहीं होने की स्थिति में पांच मई के पहले कार्यकारी सभापति का मनोनयन करना होगा.
कार्यकारी सभापति प्रो हारूण रशीद का विधान परिषद के सदस्य के रूप में कार्यकाल छह मई को समाप्त हो रहा है. संसदीय प्रावधानों के अनुसार प्रो हारूण रशीद का निर्वाचन दोबारा होगा, तो उन्हें पहले सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होगी. उनके साथ निर्वाचित सभी नये सदस्यों काे शपथ दिलाने के लिए कार्यकारी सभापति का मनोनयन आवश्यक होगा.
एक विकल्प के तौर पर यह भी संभव है कि 24 फरवरी से आरंभ हो रहे बजट सत्र के दौरान नये स्थायी सभापति का निर्वाचन हो जाये. नियम के मुताबिक सभापति का निर्वाचन चलते सत्र के दौरान ही हो सकता है. जानकारी के मुताबिक मई महीने तक मौजूदा 29 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होगा. उनकी जगह 17 सदस्यों का चुनाव के जरिये और 12 का मनोनयन के जरिये सीटें भरी जायेंगी. सदन की मौजूदा स्थिति में जदयू सबसे बड़ी पार्टी है. दूसरे नंबर पर भाजपा है.
अब विधानसभा का कार्यकाल बहुत कम दिनों का रह गया है. उपाध्यक्ष के लिए विपक्ष से भी मांग नहीं उठी. सत्ता पक्ष सेे भी इसकी पहल नहीं हुई है.
श्रवण कुमार, संसदीय कार्य मंत्री
उपाध्यक्ष के मनोनयन या चुनाव नहीं होने से सदन की गरिमा गिरी है. यह सही है कि हमलोगों ने मांग भी नहीं की, पर करें भी तो किससे करें.
जगदानंद सिंह, राजद के प्रदेश अध्यक्ष:
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