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शायर रफीउद्दीन राज ने पटना में किया नज्म-गजल का पाठ, कहा- ''''नजर में कोई मंजिल है, तो मौजे-वक्त को देखो...''''

Updated at : 22 Oct 2019 9:40 AM (IST)
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शायर रफीउद्दीन राज ने पटना में किया नज्म-गजल का पाठ, कहा- ''''नजर में कोई मंजिल है, तो मौजे-वक्त को देखो...''''

पटना : जन संस्कृति मंच की ओर से राजधानी पटना के आईएमए हॉल में आयोजित मशहूर शायर रफीउद्दीन राज की गजलों और नज्मों के पाठ का आयोजन हुआ. डॉ अरमान नज्मी ने कहा कि वे हमारी बिरादरी के बिछड़े हुए हमसफर हैं, मिट्टी की गंध उन्हें बार-बार बिहार खींच लाती है. मूलतः गजलों और नज्मों […]

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पटना : जन संस्कृति मंच की ओर से राजधानी पटना के आईएमए हॉल में आयोजित मशहूर शायर रफीउद्दीन राज की गजलों और नज्मों के पाठ का आयोजन हुआ. डॉ अरमान नज्मी ने कहा कि वे हमारी बिरादरी के बिछड़े हुए हमसफर हैं, मिट्टी की गंध उन्हें बार-बार बिहार खींच लाती है.

मूलतः गजलों और नज्मों की रचना करनेवाले रफीउद्दीन राज ने गजलों और नज्मों के अतिरिक्त रुबाई, दोहे और हाइकू भी सुनाये. उनकी गजलों में पुरानों उस्ताद की शायरों की रवायत के साथ-साथ आज की हकीकत के अक्स मौजूद थे. उन्होंने खुद को अमन का सिपाही बताया और मोहब्बत को बढ़ावा देने पर जोर दिया. अपनी गजल में उन्होंने ऊंच-नीच के भेद को गलत बताते हुए कहा कि जब दुख एक जैसे हैं, तो भेदभाव कैसा.उनका एक शेर मानो खुद उन्हीं के लिए था-

”किसी से पूछते क्या हो, जबीनों पर नजर डालो, लकीरें खुद कहेंगी, किसने कितनी खाक छानी है.”

रफीउद्दीन राज ने उर्दू को भारतीय जुबान बताते हुए कहा कि इस पर यहां की सारी जुबानों का असर है. उनकी खुशनसीबी है कि आज उनको सुननेवालों में कई जुबान के लोग हैं. उन्होंने कहा-

”उर्दू ख्याल-ओ-फिक्र का एक आसमान है,ये भारती है, इसलिए इतनी महान है.”

उनकी शायरी जीवन के गहरे अनुभवों का इजहार लगी. उनके इस शेर को श्रोताओं ने काफी सराहा-

”रहगुजर का मंजर तो एक धोखा है,रास्ता तो कदमों के अंदर होता है.”

मौजूदा दौर के खूनी और नफरत भरे मंजर पर उन्होंने सवाल उठाये. उन्होंने कहा-

”वो जा रहा है जहां आग की तरफ लेकर, गुमां ये है वहां बर्फ जम चुकी होगी.”

उनकी शायरी में गमों के बीच मुस्कुराने की बात थी, उनमें जिंदगी के लिए जद्दोजहद करने की प्रेरणा थी. रफीउद्दीन राज ने कहा-

बसारत है तो हर अनदेखा मंजर देख सकते हो, जो पत्थर में है पोशिदा वो ठोकर देख सकते हो,

नजर में कोई मंजिल है तो मौजे-वक्त को देखो, वरना तुम भी साहिल से समुंदर देख सकते हो.”

संचालन करते हुए जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने रफीउद्दीन राज के तीन शेर सुनाये- ”

न खतरा तिरगी से था, न खतरा तीरगी का है

दर, ओ-दीवार पे पहरा अभी तक रोशनी का है…”, ”

हम से कतरा के गुजर जा गमे-हस्ती,

हमलोग दश्त में फूल खिलाने का हुनर जानते हैं…”, ”

तुझे छूने की हसरत में आईने का चूर हो जाना,

तुम्हें पाने की ख्वाहिश सरमद-ओ-मंसूर हो जाना…”.

धन्यवाद ज्ञापन शायर संजय कुमार कुंदन ने किया. इस अवसर पर शायर कासिम खुर्शीद, कथाकार अवधेश प्रीत, कवि रंजीत वर्मा, अनिल विभाकर, राजेष कमल, अंचित, मो गालिब, अनीश अंकुर, अनुराधा, पुष्पराज,रंगकर्मी संतोष झा, प्रीति प्रभा, सुमन कुमार, राम कुमार, राजन कुमार आदि मौजूद थे.

कौन हैं रफीउद्दीन राज?

रफीउद्दीन राज का जन्म 21 अप्रैल, 1938 को बेगूसराय में हुआ था. अब वह कनाडा और न्यूयॉर्क में रहते हैं. उनका पैतृक घर दरभंगा में है. जीवन में वे विभाजन और युद्ध की त्रासदी से गुजर चुके हैं. रोजगार के लिए छोटी उम्र से ही कंडक्टरी और ड्राइवरी से लेकर कई तरह के काम-धंधे उन्होंने किये. उनकी गजलों का पहला संग्रह- ‘दीदा-ए-खुशख्वाब’ वर्ष 1988 में आया था. उसके बाद ‘बिनाई’, ‘पैराहने फिक्र’, ‘अभी दरिया में पानी है’, ‘रौशनी के खदोखाल’, ‘इतनी तमाजत किसलिए’, ‘जो एक दिन आईना देखा’, ‘साजो-राज’ आदि कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.

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