70 की उम्र में भी हल ढोने की मजबूरी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 May 2015 8:03 AM (IST)
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किसानों की व्यथा कथा में इस बार हम नवादा के किसान की कहानी बता रहे हैं. यहां एक 70 साल के बुजुर्ग किसान हैं, जिनकी कथा हमें मेल पर भेजी गयी है. किसान ही है जो कभी रिटायर नहीं होता, क्योंकि कभी उसकी स्थिति ऐसी नहीं होती कि वह जीवन के जंजालों से निजात पा […]
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किसानों की व्यथा कथा में इस बार हम नवादा के किसान की कहानी बता रहे हैं. यहां एक 70 साल के बुजुर्ग किसान हैं, जिनकी कथा हमें मेल पर भेजी गयी है. किसान ही है जो कभी रिटायर नहीं होता, क्योंकि कभी उसकी स्थिति ऐसी नहीं होती कि वह जीवन के जंजालों से निजात पा सके.
अशोक कुमार प्रियदर्शी, नवादा
उनके पास तीन बिगहा जमीन है. लेकिन उस जमीन से उनके पूरे परिवार की परविरश नही हो पाती है. क्योंकि पटवन की व्यवस्था नही रहने से उनकी फसल मारी जाती है. उन्हें किसीतरह का मदद भी नहीं मिल पाती है. उनके परिवार में 18 सदस्य हैं. लिहाजा, 70 की उम्र में भी खेती करना उनकी मजबूरी है.
हम बात कर रहे हैं नवादा जिले के सदर प्रखंड के देदौर गांव निवासी डोमन पंडित की. पंडित कहते हैं कि सरकार उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन उन सबों के नसीब में हल और कुदाल ही है. सरकार की जो योजनाएं चलती भी है उसका ज्यादातर लाभ गैर किसान और अधिकारी को मिलता है. डोमन पंडित मानते हैं कि किसानों की एकमात्र समस्या सिंचाई की है. इसका समाधान हो जाय तो उनसबों की बदहाली दूर हो सकती है. अब जीवन के आखिरी पडाव में है, लेकिन समस्या जस की तस है.
वैसे गांव में बिजली पहुंची है. लेकिन विभाग कभी फसल उत्पादन के समय बिजली नहीं देता. वैसे बिल महीने के महीने आता रहता है. लिहाजा, गांव में बिजली रहने के बावजूद ज्यादातर किसानों ने पंपसेट के लिए बिजली कनेक्शन नहीं लिया. खाद, बीज और कृषि उपकरण वितरित किए जाते हैं, लेकिन इसका लाभ उन किसानों को नही मिल पाता. वह कहते हैं कि सुखाड की स्थिति में भुखमरी की नौबत आ जाती है.
ऐसे में खेती छोडकर मजदूरी करनी पड़ती है. खेती से बचे समय में उनके दो बेटे राजमिस्त्री का काम करते है. इससे परिवार का गुजारा हो रहा है. सरकार से लोन लेने में भी काफी परेशानी है. इसलिए जरूरत पड़ने पर महाजन से तीन रुपए प्रति सैकड़ा प्रति माह की दर से ब्याज पर लेकर काम चलाते हैं. दो बेटियों की शादी भी महाजन से लोन लेकर की है. बाद में मजदूरी कर उस लोन की भरपाई की.लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और इंडिया टुडे के लिए लिखते हैं.
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