सीट आरक्षित होने पर कई वार्ड पार्षद हुए बेगाने

Updated at : 04 Jan 2017 3:22 AM (IST)
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सीट आरक्षित होने पर कई वार्ड पार्षद हुए बेगाने

अप्रैल, 2017 में होना है नगर निगम चुनाव बिहारशरीफ : वर्ष 2017 के अप्रैल माह में होनेवाले नगर निगम का चुनाव का सही मायने में काफी दिलचस्प होगा. यू कहे कि वार्ड पार्षदों के लिए टेंशन का दौर अब शुरू हो गया है. चुनाव को लेकर अभी से ही हर वार्ड में राजनीतिक बिसात बिछ […]

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अप्रैल, 2017 में होना है नगर निगम चुनाव

बिहारशरीफ : वर्ष 2017 के अप्रैल माह में होनेवाले नगर निगम का चुनाव का सही मायने में काफी दिलचस्प होगा. यू कहे कि वार्ड पार्षदों के लिए टेंशन का दौर अब शुरू हो गया है. चुनाव को लेकर अभी से ही हर वार्ड में राजनीतिक बिसात बिछ रही. इसमें मेयर से लेकर वार्ड पार्षद की सीट भी शामिल है. हालांकि सीट आरक्षित होने से वर्तमान पार्षद अभी से बेगाने हो गये हैं. जल्दी- से- जल्दी से अपनी राजनीतिक बिसात को विश्राम देने में लगे हैं. कई लोग अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए विश्वसनीय लोगों की तलाश में जुट गये हैं, तो कई ने दूसरे वार्ड में घुसपैठ करना आरंभ कर दिया है. इसी को लेकर अभी से शह-मात का खेल जारी है.
वैसे पार्षद जिनका वार्ड महिला आरक्षित हो गया है, वे पत्नी को ट्रेंड करना शुरू कर दिया है. जैसे नये साल की शुभकामना संदेश. मिठाई लेकर दरवाजे पर दस्तक देना. नगर निगम के द्वारा दिये गये कंबल को पत्नी से वितरण कराना प्रमुख है. नये आरक्षण रोस्टर के अनुसार उपमेयर शंकर कुमार, पूर्व उपमेयर नदीम जफर की सीट महिला के लिए आरक्षित हो गयी है. वार्ड पप्पू यादव की सीट भी महिला की झोली में चली गयी है. राजेश गुप्ता की सीट महिला के लिए आरक्षित हो गयी है. उमेश सिंह,
अविनाश कुमार सिंह की सीट बीसी कोटे में चली गयी है. हालांकि मेयर का वार्ड यथावत रह गया है. इसी प्रकार कई आरक्षित सीट सामान्य हो गयी है, तो सामान्य सीट एससी हो गयी है. बोर्ड की बैठक के रौनक रहनेवाले पार्षदों अगर स्थान नहीं बदले तो बाहर रहना पड़ेगा. वार्ड सर्वे के दौरान वोटर के मन टटोलने से एक बात उभर कर सामने आ रहा है वह यह कि 80 फीसदी वार्डों में वोटर परिवर्तन चाह रहे हैं. बिहारशरीफ नगर निगम के अधीन 46 वार्ड हैं. ऐसे में 10 से 12 वर्तमान पार्षद की ही वापसी की उम्मीद जतायी है. वोटरों की शिकायत है कि जनता कंगाल और वार्ड पार्षद मालामाल हो गये हैं. जनता की सेवा करने के स्थान पर स्वयं की सेवा में ही पांच साल तक जुटे रहें. कई पार्षदों के बारे में लोगों का यह भी कहना है कि ठेकेदार बन गये हैं.
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