वर्षों पूर्व लाल किला के नाम से जाना जाता था अमावां इस्टेट

Updated at : 04 Jul 2016 12:34 AM (IST)
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वर्षों पूर्व लाल किला के नाम से जाना जाता था अमावां इस्टेट

कलाकृति से निर्मित इस्टेट अमावां का किला बदहाल किले में 52 कोठी 53 द्वार देखने को मिल रहे तहखाना आज भी देखने के लिए दूरदराज से यहां पहुंचते हैं महल के आगे एक विशाल तालाब है बिहारशरीफ : वर्षों पूर्व लाल किला के नाम से जाना जाता था अमावां इस्टेट का किला. कलाकृति से निर्मित […]

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कलाकृति से निर्मित इस्टेट अमावां का किला बदहाल

किले में 52 कोठी 53 द्वार देखने को मिल रहे
तहखाना आज भी देखने के लिए दूरदराज से यहां पहुंचते हैं
महल के आगे एक विशाल तालाब है
बिहारशरीफ : वर्षों पूर्व लाल किला के नाम से जाना जाता था अमावां इस्टेट का किला. कलाकृति से निर्मित अमावां का किला आज बदहाल स्थिति में है. किले में आज भी 52 कोठी और 53 द्वार देखने को मिल रहे हैं.
यह किला करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले स्व. राजा हरिहर प्रसाद नारायण सिंह का निवास स्थान था. किला गांव के आधे हिस्से में फैला है और आधे हिस्से में आबादी है. किले के अंदर तहखाना आज भी देखने के लिए दूरदराज से यहां पहुंचते हैं. महल के आगे एक विशाल तालाब है. जिसका रास्ता किले के अंदर से है.
नालंदा से लेकर टेकारी तक जागीर
जानकार लोग बताते हैं कि उस जमाने में इनकी जागीर नालंदा से लेकर टेकारी गया तक फैला था. इनकी जागीर से उन जमाने में हर साल 52 लाख रुपये की राजस्व प्राप्ति होती थी. जिससे भारत के सभी तीर्थ स्थलों में मंदिर व धर्मशाला का निर्माण कराया गया था. जिसमें प्रमुख है बाढ़ का उमानाथ मंदिर. गया का रामषशीला मंदिर जहां लोग अपने पितरों का पिंडदान करने आते हैं.
यहां की मुख्य बिन्दु यह है कि इनके शासनकाल में जब जिले में कहीं बिजली
,अस्पताल की सुविधाएं नहीं थीं तो उस जमाने में भी ब्रिटिश सरकार से मिलकर अमावां पावरग्रिड का निर्माण कराया गया था. गांव व आसपास में बिजली की सप्लाई की गयी थी.
लोग कहते हैं कि जब दिल्ली में बिजली जलती थी तो उस वक्त अमावां भी बिजली जलती थी.
स्वास्थ्य लाभ को लोग आते थे अमावां
जब जिले में कहीं स्वास्थ्य लाभ के लिए अस्पताल नहीं था ,उस समय अमावां में राजकीय अस्पताल था. दूरदराज के लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए अमावां पहुंचते थे. करोड़ों की लागत से बना किला के अंदर राधा कृष्ण का मंदिर है. जहां आज भी पुरानी परंपरा से पूजा कर भोग लगाया जाता है. मंदिर व किले की देखरेख गांव के ही भवानी पांडेय कर रहे हैं. वे बताते हैं कि राजा साहब यहां पठन पाठन के लिए संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की थी. बनारस के विद्वानों पढ़ाई करते थे. आज इसकी स्थिति काफी दयनीय है. राजा साहब नवरात्र के मौके पर 24 हाथी और 60 के रथ सजाकर विजयादशमी को सवार निकलती थी. रथ क्षेत्रों का भ्रमण कर पुन: अपने स्थान पर पहुंचता था. इसके बाद राजा की ओर से भंडारे का आयोजन किया जाता था. राजा साहब का यह किला व उनके द्वारा गाड़े गये बिजली पोल ,खाली पड़े हथखाना व घोड़शाला को देखकर तथा ये सब उक्तियां सुनकर यही एहसास होता है कि कभी चमन था आज पहरा के रूप में विराजमान है.
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