चिंता. पिछले एक सप्ताह में बेन प्रखंड में पांच फुट नीचे गिरा जलस्तर, परेशानी बढ़ी

Updated at : 29 Mar 2016 3:52 AM (IST)
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चिंता. पिछले एक सप्ताह में बेन प्रखंड में पांच फुट नीचे गिरा जलस्तर, परेशानी बढ़ी

सूख रहे चापाकल, फेल हो रहे बोरिंग ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है. इसके कारण वर्षा की मात्रा निरंतर घटती जा रही है. बारिश के अभाव में जल संग्रह केंद्रों में पानी का लगातार अभाव बना हुआ है. भू-गर्भीय जल स्तर के रिचार्ज नहीं होने से जल के ऊपरी स्रोत […]

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सूख रहे चापाकल, फेल हो रहे बोरिंग

ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु में लगातार परिवर्तन हो रहा है. इसके कारण वर्षा की मात्रा निरंतर घटती जा रही है. बारिश के अभाव में जल संग्रह केंद्रों में पानी का लगातार अभाव बना हुआ है. भू-गर्भीय जल स्तर के रिचार्ज नहीं होने से जल के ऊपरी स्रोत लगातार सूखते जा रहे हैं. इसके कारण लोग गहरे स्रोतों का दोहन करने लगे हैं. इसका असर शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में साफ दिखने लगा है.
बिहारशरीफ : जिले में भू-गर्भीय जल स्तर के लगातार नीचे गिरने का सिलसिला जारी है. इसका असर शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में साफ दिखने लगा है. शहरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा धनेश्वर घाट व मणिराम अखाड़ा क्षेत्र में भू-गर्भीय जल गिरने की सूचना है.
धनेश्वर घाट में भू-गर्भीय जल का स्तर 100-110 फुट तक जबकि मणिराम अखाड़ा क्षेत्र में 80-90 फीट तक चला गया है. प्रखंडों की बात करें तो बेन प्रखंड में सबसे ज्यादा भू-गर्भीय जल स्तर के गिरने की जानकारी विभाग से मिली है. पिछले एक सप्ताह के दौरान बेन प्रखंड में भू-गर्भीय जल स्तर पांच फुट नीचे खिसका है. अन्य प्रखंडों में भी डेढ़ से दो फुट भू-गर्भीय जल स्तर के नीचे खिसक जाने की सूचना है.
जैसे-जैसे गरमी तेज होती जा रही है चापाकलों के सूखने व बोरिंग के फेल होने का सिलसिला तेज हो गया है. शहर के ही दो जलापूर्ति केंद्रों से पानी का डिस्चार्ज कम होने के बाद विभाग को पाइप बढ़ानी पड़ी. जापूर्ति केंद्रों से पानी का डिस्चार्ज कम होने की वजह से मोटर जलने का सिलसिला भी तेज हो गया है. शहर के मणिराम अखाड़ा जलापूर्ति केंद्र का मोहर इसी कारण जल गया, जिसे विभाग को आनन-फानन में बदलना पड़ा है.
इसी प्रकार प्रखंडों में से भी चापाकलों के फेल होने की शिकायतें विभाग को मिलनी शुरू हो गयी हैं. जिले के करीब 25 ऐसे चापाकलों में पाइप जोड़ने के बाद फिर से पानी निकलना शुरू हुआ है.
जल की जरूरत की पूर्ति नदी से नहीं हो रही
सुप्रसिद्ध गीतकार व संगीतकार रवींद्र जैन रचित एक गाना ‘ जल जो न होता तो ये जग जाता जल’ काफी लोकप्रिय है. इस गाने के माध्यम से जल की महत्ता को बताया गया है. वर्तमान समय में कृषि, पेयजल, पशुपालन व उद्योग के लिए जल का प्रयोग हो रहा है.
इसी पूर्ति नदी जल से नहीं होने के कारण भू-गर्भीय जल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है. बारिश नहीं होने से जलस्तर रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं. इसके कारण भू-गर्भीय जल स्तर प्रति वर्ष एक से दो फुट नीचे खिसकते जा रहे हैं.
फलस्वरूप भू-गर्भीय जल के ऊपरी स्रोत सूखते जा रहे हैं. लोग अपनी आवश्यकताओं की पूत्रि के लिए गहरे जल स्रोतों का दोहन करने लगे हैं. पिछले कई वर्षों से पर्याप्त मात्रा में बारिश नहीं होने से ताल-तलैया सभी सूखे पड़े हैं.
नगरनौसा प्रखंड के रानगर सरैया के किसान चक्रधर प्रसाद, राजेंद्र प्रसाद बताते हैं कि उनके गांव में एक बहुत बड़ा तालाब है. बरसात के दिनों में इस तालाब के भर जाने से धान, गेहूं व अन्य फसलों की सिंचाई होती थी. आसपास के गांवों का वाटर लेवल भी ऊपर रहता था, मगर पिछले तीन वर्षों से बारिश के अभाव में तालाब नहीं भर पाया है. इसके कारण विकट स्थिति पैदा हो गयी है.
चापाकलों व जलापूर्ति केंद्रों में जोड़ा जा रहा पाइप
पिछले तीन साल में पानी से नहीं भरा तालाब
भू-जल स्रोतों को सुरक्षित रखना मुश्किल
गहरी भू-जल स्रोतों के दोहन से भूमि से पानी निकालने की लागत भी बढ़ गयी है और कृषि उत्पादन की लागत में वृद्धि हो गयी है. मानव, पशुधन, कृषि की जरूरत को देखते हुए भू-जल स्रोतों को सुरक्षित रखना भी मुश्किल होता जा रहा है. फसल की नवीनतक बौनी व संकर प्रजातियों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है. अखिल सिंचाई के लिए जल की आवश्यकता के चलते अधिक मात्रा में भू-जल का दोहन हो रहा है. इसके अलावा धन अर्जन मकी इच्छा में अधिक सिंचाई वाले नकदी फसलों आलू, गन्ना, धान, गेहूं, सब्जी आदि का अधिक उत्पादन हो रहा है. तेजी से बढ़ रही आबादी को पेयजल उपलब्ध कराने के लिए भी भू-गर्भीय जल का दोहन तेजी से हो रहा है.
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