समाज जिसे समझ बैठा था 'मृत', भाई के अटूट विश्वास ने 41 साल बाद उसे जिंदा लौटाया

41 साल बाद दो भाई उमेश मिश्र और वीरेंद्र मिश्र मर्मस्पर्शी मिलन
41 साल बाद अचानक घर लौटे बड़े भाई उमेश मिश्र को देखकर पूरा गांव सन्न रह गया. असम से गुजरात तक भटकने वाले उमेश की वापसी के पीछे छोटे भाई वीरेंद्र का अटूट विश्वास था, जिसने समाज के तानों को झुठला दिया.
मुजफ्फरपुर के कांटी से मनोज कुमार मिश्र की रिपोर्ट
Muzaffarpur Emotional Reunion: यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपी है एक भाई की वो बेबसी, जिसने उसे अपनों से 41 साल दूर रखा, और दूसरे भाई का वो जिद्दी विश्वास, जिसने मौत की अफवाहों को भी हरा दिया. मुजफ्फरपुर जिले के कांटी प्रखंड के गोदाई फुलकाहा (वार्ड 4) गांव में जब 5 जुलाई 2026 की सुबह पोखरैरा निवासी दिवंगत राम खिलावन मिश्र के बड़े बेटे उमेश मिश्र अचानक अपने दरवाजे पर आकर खड़े हुए, तो पूरे गांव की सांसें थम गईं. 41 साल बाद बड़े भाई को जीवित और अपने सामने देख छोटे भाई वीरेंद्र मिश्र फूट-फूटकर रो पड़े.
अंजान डर की बेड़ियों में जकड़ी रही ममता, असम से गुजरात तक अपनों को तरसती रहीं आंखें
घर लौटने पर उमेश मिश्र ने जो दर्द बयां किया, उसने सबकी आंखें नम कर दीं. उन्होंने बताया कि वे साल 1986 में सिर्फ दो वक्त की रोटी कमाने की नीयत से असम चले गए थे. वक्त बीतता गया, लेकिन एक अजीब और अनजान डर ने उन्हें ऐसा जकड़ा कि वे चाहकर भी कभी घर लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. परिजनों ने जब पूछा कि क्या कभी हमारी याद नहीं आई? तो उमेश भर्राई आवाज में बोले, "हर दिन, हर पल परिवार की याद आती थी, लेकिन पैर जैसे बंध चुके थे."
"तुम्हारा भाई मर गया, उसका श्राद्ध कर दो..." समाज के तानों के आगे नहीं झुका छोटा भाई
इस पूरी दास्तां का सबसे मर्मस्पर्शी पहलू छोटे भाई वीरेंद्र मिश्र का अटूट विश्वास है. साल 1995 में पिता की मौत के बाद वीरेंद्र ने भाई को खोजने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था. 1996 में उन्हें पता चला कि उमेश असम में हैं, वे वहां गए भी, पर उमेश ने 'बाद में आऊंगा' कहकर उन्हें भेज दिया और फिर गुजरात चले गए. इसके बाद वर्षों तक कोई खबर नहीं मिली. ग्रामीण बार-बार वीरेंद्र से कहते थे, "अब तुम्हारा भाई इस दुनिया में नहीं रहा, उसका श्राद्धकर्म कर दो." इस बात को लेकर वीरेंद्र का अपनी पत्नी और परिवार से कई बार झगड़ा और कलह भी हुआ, लेकिन वीरेंद्र हर बार रोते हुए यही कहते थे, "मेरा भाई जिंदा है, मैं उसका श्राद्ध कभी नहीं करूंगा."
एक हादसे ने तोड़ा 'डर का पहरा' और दरवाजे पर आकर ठहर गईं आंखें
साल 2024 में गुजरात के गांधीधाम में एक भीषण सड़क हादसे के दौरान जब उमेश मिश्र एक चार पहिया वाहन की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हुए, तो मौत को करीब देख उनका वो अनजान डर टूट गया. अस्पताल के बिस्तर पर उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने भाई और गांव की मिट्टी याद आने लगी. दो साल के लंबे इलाज और कड़े संघर्ष के बाद, आखिरकार 5 जुलाई को वे अपने घर पहुंचे. आज पूरा गांव वीरेंद्र के उस अटूट विश्वास को सलाम कर रहा है, जिसने 41 साल बाद एक बिखरे हुए परिवार को फिर से एक कर दिया.
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By सुनील कुमार सिंह
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