पर्यटन के मानचित्र पर उभरेगा एतिहासिक धरोहर पीर पहाड़़, सीएम ने दिया डीपीआर तैयार करने का निर्देश

Published by :BIRENDRA KUMAR SING
Published at :08 May 2026 7:02 PM (IST)
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पर्यटन के मानचित्र पर उभरेगा एतिहासिक धरोहर पीर पहाड़़, सीएम ने दिया डीपीआर तैयार करने का निर्देश

मुंगेर मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर गंगा तट पर अवस्थित एतिहासिक पीर पहाड़ के पर्यटन के मानचित्र पर उभरने की संभावना प्रबल हो गयी है.

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मुंगेर. मुंगेर मुख्यालय से तीन किलोमीटर दूर गंगा तट पर अवस्थित एतिहासिक पीर पहाड़ के पर्यटन के मानचित्र पर उभरने की संभावना प्रबल हो गयी है. क्योंकि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पीरपहाड़ को विकसित करने के लिए पर्यटन विभाग के सचिव को डीपीआर तैयार करने का निर्देश दिया है. पीर पहाड़ के विकसित होने से न सिर्फ यह पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करेगा, बल्कि क्षेत्र के विकास में मील का पत्थर साबित होगा. साथ ही रोजगार के अवसर का भी सृजन होगा.

सीएम ने सचिव को दिया डीपीआर तैयार करने का निर्देश

मुंगेर के भाजपा विधायक कुमार प्रणय ने बताया कि पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तारापुर आए थे, तो उन्होंने गंगा तट पर अवस्थित पीर पहाड़ की ऐतिहासिक पृष्टभूमि और पहाड़ की चोटी से दिखने वाले रमणीक दृश्य से अवगत कराया गया था. उन्होंने कहा कि अगर पीर पहाड़ को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाय तो यह निश्चित तौर पर बिहार का एक महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल बन सकता है. इस क्षेत्र के विकास में भी मील का पत्थर साबित होगा. इस क्षेत्र के बेरोजगारों के लिए इसका विकास रोजगार का भी अवसर प्रदान करेंगा. उन्होंने कहा कि सीएम खुद इस जिले के हैं और वे खुद पीर पहाड़ से अवगत थे. उनकी मांग पर सीएम ने पर्यटन विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि पीर पहाड़ को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने के लिए एक डीपीआर तैयार करें. विधायक ने कहा कि सीएम ने आश्वासन दिया है कि शीघ्र ही पीर पहाड़ को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए काम शुरू कर दिया जायेगा.

समृद्ध है पीर पहाड़ का इतिहास

पीर पहाड़ मुंगेर के उन एतिहासिक स्थलों में से एक है जो 13वीं शताब्दी से मौजूद है. कहा जाता है कि 13वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान इस पहाड़ी पर एक प्रसिद्ध मुस्लिम संत के अवशेष मिले थे. उनकी मृत्यु के बाद पहाड़ी की चोटी पर अष्टकोणीय गुंबद वाला एक मकबरा बनाया गया था. जो आज भी इसका गवाह है. जिसका जिक्र डेविड गॉर्डन व्हाइट की पुस्तक किस ऑफ द योगिनी में भी मिलती है. बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी के मध्य (1640-1650 के दशक) में मुगल बादशाह शाहजहां ने इस क्षेत्र पर शासन के लिए अपने बेटे शाहसूजा को मुंगेर भेजा था. जो पीर पहाड़ पर रहकर ही बिहार, बंगाल और ओडिशा पर शासन संचालित करते थे. इसके बाद मीर कासिम ने जब मुंगेर को अपनी राजधानी बनायी, तब उनके सेनापति गुर्गीन खान इसी पीर पहाड़ पर रहते थे. यहां के खंडरनुमा महल और पहाड़ियों की कहानियां रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी हैं. जिन्होंने गीतांजलि के कुछ गीत यहीं लिखे थे. इस स्थान की सुंदरता का वर्णन यूनाइटेड किंगडम के येल सेंटर फॉर ब्रिटिश आर्ट में भी किया गया है. पहाड़ के ऊपर से सूर्योदय और सूर्यास्त हमेशा मनमोहक होते हैं, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण इसका वर्तमान बेहद ही खंडहर में तब्दील हो चुका है.

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