मुसहरनिया डीह को सुरक्षित स्मारक घोषित करने के दिशा में पहल शुरू

Updated at :31 Mar 2017 4:58 AM
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मुसहरनिया डीह को सुरक्षित स्मारक घोषित करने के दिशा में पहल शुरू

जागरुकता. कला संस्कृति विभाग के निदेशक ने दिये सामग्री को सहेजने के निर्देश मुसहरनिया डीह पर हैं बौद्ध सर्किट के साक्ष्य जल्द ही उठेगा रहस्य से परदा मधुबनी/अंधराठाढी : प्रखंड मुख्यालय से महज चार किलोमीटर की दूरी पर नवटोली पस्टन गांव स्थित मुसहरनिया डीह को जल्द ही पुरातात्विक स्थल का विधिवत दर्जा दिये जाने एवं […]

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जागरुकता. कला संस्कृति विभाग के निदेशक ने दिये सामग्री को सहेजने के निर्देश

मुसहरनिया डीह पर हैं बौद्ध सर्किट के साक्ष्य जल्द ही उठेगा रहस्य
से परदा
मधुबनी/अंधराठाढी : प्रखंड मुख्यालय से महज चार किलोमीटर की दूरी पर नवटोली पस्टन गांव स्थित मुसहरनिया डीह को जल्द ही पुरातात्विक स्थल का विधिवत दर्जा दिये जाने एवं इसे सुरक्षित स्मारक घोषित करने के दिशा में कवायद शुरू हो गयी है. इस दिशा में सरकार कला संस्कृति एवं युवा विभाग के निदेशक ने इस डीह के ईट एवं अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है. सरकार के इस निर्देश के आलोक में जिला पदाधिकारी गिरिवर दयाल सिंह ने भी झंझारपुर एसडीओ, डीएसपी एवं अंधराठाढी प्रखंड के बीडीओ, सीओ व थाना प्रभारी को आवश्यक पत्र जारी करते हुए निर्देश दिया है.
सरकार के इस आदेश के बाद स्थानीय लोगों में हर्ष व्याप्त है. मालूम ह कि मुसहरनियां डीह पर बौद्ध विहार होने के साक्ष्य मिलते रहे हैं. पर अब इस दिशा में विशेष रूप से पहल की जा रही है. सरकार अब जल्द ही इस डीह के ईट व अन्य सामग्री को सहेज कर उसे पुरातत्व विभाग को सौंपने वाली है. ताकि इन सामग्री से इस डीह के वास्तविकता का पता चल सके.
आज भी हल और कुदाल चलते समय आस पास बुद्ध आदि की छोटी छोटी मूर्तियां और उपयोग में आने वाली मिट्टी के बर्तन आदि मिलते रहते हैं कुछ मूर्तियां स्थानीय वाचस्पति संग्रहालय में रखी हुयी है. बौद्ध विहार की जमीन और टीलें अतिक्रमित हो कर खेत बनते जा रहे है. सुरक्षा और रखरखाव नहीं होने के कारण भग्नावशेष लुप्त होने के कागार पर है.
पुरातत्व विभाग ने पहले भी किया है सर्वेक्षण
गांव के मुशहरनियां डीह पर में बौद्ध विहार होने के साक्ष्य हैं. भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन बिहार सर्किल हेड डाॅ. पीके झा ने भी पस्टन का सर्वेक्षण किया था. उनके अनुसार यहां कभी बौद्ध विहार रहने की बात बहुत हद तक सही है. जिस प्रकार के साक्ष्य व प्रमाण मौजूद हैं वह यह साबित करने के लिए काफी है कि चीन से भारत आने वाले एवं भारत से चीन एवं तिब्बत जाने वालों का यह एक ठहराव केंद्र रहा करता था. डीह में बौद्ध साधुओं के ठहरने, पेय जल के लिए कुआं और स्नान करने के लिये पोखर घाट के चिह्न आज भी विद्यमान. एक प्रसिद्ध चीनी यात्री ने बौद्ध साहित्य में भी बिहार के पट्टन गांव की चर्चा है. वर्तमान में पस्टन गांव का भौगोलिक स्थिति और आस-पास के गांव आदि इसी पट्टन गांव से मिलता जुलता है.
उस साहित्य में वर्णित पट्टन से जनकपुर की दूरी भी एक ही है. सामाजिक रीति-रिवाज खान पान आदि भी इस पस्टन गांव से मेल खाता है. विद्वानों का मानना है कि ही पट्टन ही कालान्तर में बोलचाल में पस्टन हो गया है. हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि पस्टन नवटोली गांव में मौजूद टीले कर्णट बंशीय राजा हरिसिंह देव के राज महल का भग्नावशेष है. यहां उनके नाम पर हरिसिंहदेव संस्कृत मध्य और उच्च विद्यालय है प्रसिद्ध पुस्तक मिथिला विमर्श तत्व में भी इसकी प्रमुखता से चर्चा की गयी है.
पर, अधिकांश विद्वान मुसहरनियां डीह के टीले को बौद्ध सर्किट ही मानते हैं. सतर्कता विभाग से सेवानिवृत डीएसपी इन्द्र नारायण झा ने मिथिला दिगदर्शन में भी पस्टन मुशहरनिया डीह को बौद्ध मठ ही माना है. वहीं पुरातत्व विद पंडित सहदेव झा पस्टन मुसहरनिया डीह को बौद्ध भिक्षुओं के रूकने का जगह माना है.
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