ग्लोबल टेंडर पर सियासत तेज, विधान पार्षद ने सरकार को घेरा

ग्लोबल टेंडर पर सियासत तेज, विधान पार्षद ने सरकार को घेरा
मधेपुरा. विधान पार्षद डॉ अजय कुमार सिंह ने राज्य सरकार के ग्लोबल टेंडर व्यवस्था पर सवाल उठाया. विधान पार्षद ने ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी से भी सवाल किया. उन्होंने आरोप लगाया कि इस मॉडल के कारण स्थानीय छोटे ठेकेदार धूल फांकने को मजबूर हैं, जबकि बड़े संवेदक काम लेकर उसे पेटी कांट्रेक्टर के हवाले कर देते हैं. डॉ सिंह ने कहा कि ग्लोबल टेंडर की प्रक्रिया से विकास कार्यों की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो रही हैं. बड़े ठेकेदार सीधे काम करने के बजाय उप-ठेकेदारों की तलाश करते हैं, जिससे जवाबदेही तय नहीं हो पाती और परियोजनाएं अधूरी रह जाती हैं. डॉ सिंह ने वर्ष 2005 का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह के कार्यकाल में एनटीपीसी और एनएचपीसी जैसी एजेंसियों को ग्लोबल टेंडर दिया गया था. उस समय काम अधूरा रहने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने आपत्ति जतायी थी. बाद में ‘पार्ट-बाय-पार्ट’ निविदा प्रणाली लागू की गयी, जिससे स्थानीय ठेकेदारों को अवसर मिला और जवाबदेही बढ़ी. विधान पार्षद ने आरोप लगाया कि मंत्री अशोक चौधरी के विभाग में बड़ी एजेंसियों को सड़कों का जिम्मा दिया गया, लेकिन कई जगह काम अधूरा है. उन्होंने कहा कि अधिकारियों के पास स्पष्ट वर्क चार्ट तक नहीं है और संवेदकों को यह तक पता नहीं कि उन्हें क्या और कब तक करना है. उन्होंने समय सीमा में काम पूरा नहीं करने वाले ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने की मांग की. लोकल को प्राथमिकता देने की मांग विधान पार्षद ने सरकार से आग्रह किया कि भविष्य की निविदाओं में ‘ग्लोबल’ के बजाय ‘लोकल’ मॉडल अपनाया जाए. निविदाओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर स्थानीय ठेकेदारों को भागीदारी का अवसर दिया जाए. साथ ही लंबित परियोजनाओं की समीक्षा कर दोषी अधिकारियों और संवेदकों पर कार्रवाई की मांग की है. डॉ सिंह ने कहा कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो विकास कार्यों की रफ्तार और जनहित दोनों प्रभावित होंगे. पेटी कांट्रेक्टर’ मॉडल पर सवाल वहीं राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (इंटक) के जिलाध्यक्ष संजय कुमार सिंह ने भी इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए कहा कि ग्लोबल टेंडर लेने वाली कंपनियां फील्ड में काम छोटे और अनुभवहीन उप-ठेकेदारों को सौंप देती हैं. इस चेन सिस्टम से बजट का बड़ा हिस्सा कमीशन में चला जाता है और निर्माण कार्य की गुणवत्ता प्रभावित होती है.
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