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Madhepura news : चीनी मिल की चिमनी से नहीं निकला धुआं, टूटे किसानों के सपने

Updated at : 19 May 2024 6:30 PM (IST)
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Madhepura news : चीनी मिल की चिमनी से नहीं निकला धुआं, टूटे किसानों के सपने

तीनटेंगा में वर्षों से बंद चीनी मिल.

Madhepura news : मधुबन चीनी मिल की चिमनी से धुआं निकले जमाना हो गया. हजारों टन चीनी का उत्पादन करनेवाला यह मिल आज उपेक्षित पड़ा है.

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Madhepura news : एक जमाने में मधेपुरा के उदाकिशुनगंज का इलाका उद्योग-धंधों के लिए जाना जाता था. किसान समृद्धि की कहानी रचने लगे थे.फिजां में चीनी की मिठास भरी होती थी. पर, पिछले ढाई दशक से किसान अपनी उम्मीदों का जनाजा लिये फिर रहे हैं, क्योंकि मधुबन चीनी मिल की चिमनी से धुआं निकले जमाना हो गया. हजारों टन चीनी का उत्पादन करनेवाला यह मिल आज उपेक्षित पड़ा है. मिल के सहारे अपनी दशा सुधारनेवाले किसान मायूस हैं. इस मिल से न केवल मधुबन गांव, बल्कि मधेपुरा जिले के साथ पड़ोसी जिले के भी हजारों किसान जुड़े थे. इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी, लेकिन जबसे मिल बंद हुआ, गन्ने की खेती भी कम होती गयी. सूबे में सरकार बदली, तो मिल फिर से चालू होने की उम्मीद जगी, पर ऐसा हो न सका.

सरकार की घोषणा निकली हवा-हवाई

किसानों का आरोप है कि विकास की सरकार में भी मधुबन गांव में चीनी मिल चालू नहीं हुआ. मिल चालू होते देखने के लिए क्षेत्र के लोगों को और कितना इंतजार करना पड़ेगा, यह किसी को पता नहीं है. अब तो पूरे 26 वर्ष हो गये इसकी चिमनी से धुआं निकले. बताया जाता है कि बनमनखी चीनी मिल बंद होने के बाद इस मिल से मधेपुरा जिले ही नहीं, पूर्णिया व मधुबनी समेत अन्य जिलों के हजारों किसान जुड़े थे. मिल के कारण इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती थी. नीतीश सरकार ने बंद चीनी मिलों को चालू करने की बात कही थी. इससे इलाके के लोगों व किसानों में एक बार फिर आस जगी थी, लेकिन वह घोषणा भी हवा-हवाई ही निकली.

वर्ष 2006 में मिल शुरू करने की हुई थी पहल

सरकार ने भी उदाकिशुनगंज अनुमंडल के तीनटेंगा में चीनी मिल लगाने की घोषणा की थी. पर, 17 साल बाद भी मिल नहीं लगा. वर्ष 2006 में चीनी मिल लगाने की कवायद शुरू हुई थी. 2016 में धामपुर शुगर मिल लगाने की घोषणा से किसानों में खुशी थी. बताया जाता है कि मधुबन पंचायत स्थित तीनटेंगा गांव के समीप तत्कालीन मंत्री डॉ रेणु कुमारी कुशवाहा की पहल पर 2006 में धामपुर चीनी मिल लगाने की घोषणा की गयी थी. इसके बाद 30 जुलाई, 2016 को बिहार सरकार के तत्कालीन गन्ना विकास राज्य मंत्री नीतीश मिश्रा, पूर्व मंत्री डॉ रेणु कुमारी कुशवाहा, नरेंद्र नारायण यादव, धामपुर शुगर मिल के संस्थापक विजय गोयल के साथ यहां पहुंचे और मिट्टी की जांच कृषि विभाग से करायीगयी. यहां की मिट्टी गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त पायी गयी थी. इसलिए भूमि सर्वेक्षण कर चीनी मिल लगाने पर सहमति दी गयी थी.

भूमि अधिग्रहण के पेच में फंसा मामला

धामपुर शुगर मिल के लिए 300 एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहित करनी थी. इसके लिए उदाकिशुनगंज अनुमंडल के बिहारीगंज स्थित जवाहर चौक के पास किराये के एक निजी मकान में वर्ष 2007 में धामपुर शुगर मिल का कार्यालय खोला गया था. बताया जाता है कि शुगर मिल के लिए बिहारीगंज के गमैल और मधुबन तिनटेंगा मौजा की 280 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया कर ली गयी थी, लेकिन अधिकतर भूमि पर किसानों का वर्षों से कब्जा रहने की वजह से मामला उच्च न्यायालय में चला गया और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर ग्रहण लग गया. इस कारण धामपुर चीनी मिल के संस्थापक मिल लगाने से पीछे हट गए और आनन-फानन में बिहारीगंज कार्यालय बंद करा दिया गया. इस वजह से शुगर मिल खोलने की प्रक्रिया पर ग्रहण भी लग गया.

बनमनखी मिल बंद होने से गुम हुई गन्ने की मिठास

ज्ञात हो कि सीमावर्ती पूर्णिया जिले के बनमनखी में 1970 से 1990 तक चीनी मिल संचालित रहने से किसानों को गन्ना बेचने में आसानी होती थी. वर्ष 1990 में चीनी मिल में घाटा होने की बात कह कर इसे बंद कर दिया गया था. उसके बाद किसानों को नुकसान होने लगा. कुछ वर्षों से गन्ने की खेती के लिए मौसम के प्रतिकूल असर की वजह से अन्नदाताओं को कड़ी मेहनत के बाद भी सरकारी उपेक्षा के कारण घाटा उठाना पड़ा. इस वजह से गन्ने की खेती प्रभावित होने लगी. इस क्षेत्र में चीनी मिल नहीं रहने के कारण किसान गन्ने की खेती से पीछे हटने लगे.

आमदनी का जरिया हो गया समाप्त

मधुबन गांव के दशरथ मेहरा ने बताया कि यहां के किसानों की मुख्य फसल गन्ना थी. उन्हें एकमुश्त नकदी मिल जाती थी, जो उनके जीविकोपार्जन का आधार था. किसान घर बनाने से लेकर शादी-विवाह तक इसी आमदनी से करते थे. मिल बंद होने के बाद अब किसानों के पास पारंपरिक खेती के अलावा कोई विकल्प नहीं है. अब तो अधिकतर किसानों ने इसकी खेती करना ही छोड़ दिया है. सत्यनारायण मेहता कहते हैं कि मिल बंद होने से किसानों की नकदी फसल का जरिया समाप्त हो गया है. एक बार गन्ना लगाने से दो वर्ष तक उससे उपज मिलती थी, जिससे किसानों को समय व संसाधन की बचत होती थी और अच्छी नकद आमदनी हो जाती थी. किसानों की आमदनी का बड़ा स्रोत समाप्त हो गया है.

खुले मिल, तो फिर शुरू होगी गन्ने की खेती

किसान संजय सिंह ने बताया कि घोषणा होने के बाद कुछ आस जगी थी कि अब हमलोगों को नकदी फसल का उचित दाम मिलेगा. पर, इतने वर्ष बाद भी मिल चालू नहीं हुआ. इससे किसानों के सपनों पर पानी फिर गया. प्रीतम मंडल ने कहा कि बीच-बीच में किसानों को कई बार प्रशिक्षण भी दिया गया, लेकिन चीनी मिल नहीं होने के कारण यह प्रशिक्षण भी बेकार साबित हुआ. किसान उमाशंकर मेहता, यशवंत कुमार, मिथिलेश कुमार मेहता, प्रभाष कुमार मेहता, सिकंदर सिंह, सीताराम मंडल, प्रियरंजन मंडल, पृथ्वीचंद्र मंडल, अर्जुन पंडित, राजकिशोर पंडित, विश्वनाथ पंडित, शंकर दास, राजेंद्र दास, बिरेंद्र दास, भागवत मेहता, जयकांत मेहता, उमेश मेहता, प्रेमजीत कुशवाहा व अन्य ने बताया कि अब भी अगर मिल खुल जाये तो गन्ने की खेती बड़े पैमाने पर शुरू की जा सकती है.

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Sharat Chandra Tripathi

लेखक के बारे में

By Sharat Chandra Tripathi

Sharat Chandra Tripathi is a contributor at Prabhat Khabar.

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