सिंहेश्वर न्यास को लगा लाखों का चूना

Published at :03 Dec 2016 8:39 AM (IST)
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सिंहेश्वर न्यास को लगा लाखों का चूना

बेरोजगारों को आजीविका मिलने के उद्देश्य से मामूली किराये पर उपलब्ध भूखंड पर दुकान बना कर कमा रहे लाखों रुपये सिंहेश्वर : पंडा समाज के एकाधिकार को समाप्त करते हुए सिंहेश्वर मंदिर न्यास समिति का गठन कोर्ट के आदेश पर किया गया था. हालांकि यह मामला कोर्ट में अब तक लंबित है. लेकिन जिस उद्देश्य […]

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बेरोजगारों को आजीविका मिलने के उद्देश्य से मामूली किराये पर उपलब्ध भूखंड पर दुकान बना कर कमा रहे लाखों रुपये
सिंहेश्वर : पंडा समाज के एकाधिकार को समाप्त करते हुए सिंहेश्वर मंदिर न्यास समिति का गठन कोर्ट के आदेश पर किया गया था. हालांकि यह मामला कोर्ट में अब तक लंबित है. लेकिन जिस उद्देश्य से न्यास समिति का गठन किया गया था, न्यास अपने उद्देश्य को पूरा करने में पिछड़ रही है.
वैसे अन्य मामले को छोड़ भी दें तो मेला परिसर क्षेत्र में अस्थायी दुकान को लेकर भी न्यास का रूख सकारात्मक नहीं है. वर्षों से बनी दुकानों का न तो पक्कीकरण किया जा रहा है और वर्तमान में जिस भूखंड को किराये पर दिया गया है, उनसे नियमित रूप से किराया की वसूली ही की जा रही है. हाल यह है कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्ति के पास सत्तर से अस्सी हजार रुपये किराया जमा नहीं करने के कारण बकाया हैं. न्यास इनसे यह रकम वसूलने में हमेशा से कोताही बरतता रहा है. हालांकि यह दीगर है कि इन किराया को टालने की एवज में भारी रकम की लेनदेन होती है. न्यास कर्मी इनकी आड़ में बाबा सिंहेश्वर नाथ को लाखों का चूना लगा चुके हैं. और यह सिलसिला जारी है.
… और हजारों में बिक जाती हैं दुकानें . न्यास समिति मेला परिसर में दुकान लगाने वालों को प्रति वर्ग फीट की दर से भूखंड आवंटित करती है. एक वर्ग फीट का किराया डेढ़ रूपये लिया जाता है.
अगर साधारणतया एक सामान्य दुकान का आकार एक सौ वर्ग फीट होता है तो दुकानदार न्यास को प्रतिमाह डेढ़ सौ रूपये किराया अदा करेगा. वैसे शिवरात्रि मेला के एक महीने के दौरान रेलिंग फीट की दर से किराया अदा करना होता है. इसका किराया मेला के ठेकेदार तय करते हैं. किराया भी ठेकेदार ही वसूल करता है. वहीं साल के शेष ग्यारह महीने न्यास समिति किराया वसूलती है. मेला परिसर में दुकान के लिये भूखंड देने के पीछे न्यास समिति की मंशा बेरोजगारों और असहायों को स्वरोजगार का अवसर देना है. बेरोजगारों को कम कीमत पर भूखंड उपलब्ध हो जाता है, जिस पर वह कच्चा निर्माण कर दुकानें बना लेते हैं और वे अपने परिवार का भरन-पोषण करते हैं. लेकिन न्यास समिति की इस मंशा के साथ कुछ लोग खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते हैं. कई लोग इसे अपनी पैतृक संपत्ति की समझ कर अपनी दुकान दूसरे के हाथ हजारों रुपये में बेच लेते हैं.
मालिक कोई और, दुकानदार कोई और . मेला परिसर में अस्थायी दुकानदारों में ज्यादातर कम पूंजी के व्यवसायी, कारीगर, टॉर्च मरम्मत करने वाले, चूड़ी बेचने वाले, पुराने कपड़े की दुकानें आदि हैं. लेकिन अगर न्यास समिति में अस्थायी दुकानदारों के रजिस्टर की जांच की जाये तो इन दुकानों के मालिक कोई और ही हैं. ये भूखंड मालिक न्यास समिति को महज एक से दो सौ रूपये किराया देते हैं और अपनी दुकान को दूसरे को किराये पर दे कर खुद हजार से डेढ़ हजार तक प्रति माह किराया वसूलते हैं.
और तो और इन दुकानों को किराया देने से पहले वे पगड़ी के तौर पर दस हजार से पच्चीस हजार तक लेते हैं. हद तो यह है कि ऐसे भूखंड मालिक में से ऐसे दर्जनों लोग हैं जिन्होंने वर्षों से न्यास का किराया अदा नहीं किया है. कुछ लोगों पर तो दस हजार से अस्सी हजार किराया बकाया है और अगर हिसाब जोड़ जाये तो ये लोग अपने किरायेदारों से इतने वर्षों में करीब पचास से साठ लाख रूपये कमा चुके हैं.
चलते रहते हैं विवाद .इन भूखंड मालिक और इनके किरायेदारों में अक्सर किराया भुगतान को लेकर विवाद चलते रहते हैं. विशेषकर मेला के समय जब इन भूखंड का किराया रेलिंग फीट के अनुसार अधिक देना पड़ता है तो इस किराया को चुकाने के समय भूखंड मालिक और दुकानदारों में विवाद उत्पन्न हो जाता है.
भूखंड मालिक अपने किरायेदार दुकानदारों पर मेला ठेकेदार को किराया भरने कहते हैं और किरायेदार निर्धारित माहवार किराया देने के बाद कुछ नहीं देना चाहते हैं. अक्सर इन विवाद को न्यास समिति के कर्मी बीच बचाव कर सुलझाते हैं. कई बार इन विवादों को सुलझाने के नाम पर दोनों पक्षों को अच्छी खासी रकम भी खर्च करना पड़ता है. लेकिन यह राशि किसकी जेब में जाती है पता नहीं.
किरायेदारों ही होंगे मालिक, लिया फैसला .मेला परिसर में भूखंड मालिकों और उनके किरायेदारों के बीच होने वाले विवाद का आकार बढ़ने लगा और मामला हाथ से निकलने लगा तब इन मामलों में न्यास समिति के सदस्यों को हस्तक्षेप करना पड़ा.
न्यास समिति की बैठक में बार-बार मुद्दा उछलने पर सदस्य और तत्कालीन सचिव ने कड़ा रूख अख्तियार करते हुए भूखंड मालिक का स्वामित्व समाप्त करते हुए उनका बकाया किराया वास्तव में दुकान कर रहे दुकानदारों से लेकर उनके नाम पर ही भूखंड स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया. इसी के आलोक में उपसमिति गठित करते हुए सर्वेक्षण का कार्य किया जा रहा है. इसके कारण ऐसे भूखंड मालिकों में अफरातफरी की स्थिति बन गयी है.
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