पुस्तैनी काम से विमुख हो रही महार विरादरी

Published at :03 Feb 2016 5:11 AM (IST)
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पुस्तैनी काम से विमुख हो रही महार विरादरी

उदाकिशुनगंज : बांस पर आधारित पुस्तैनी रोजगार करने महार जाति के लोगों के सामने कार्यशील पूंजी व उपयुक्त बाजार के अभाव में धंधा बंदी के कगारपर पहुंच गया है. जिससे इस रोजगार पर आश्रित महाविरादरी परिवारों के सामने रोजी रोटी की समस्या उत्पन्न हो गयी है. चूंकि ऐसे परिवारों के पास न तो उपजाउ भूमि […]

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उदाकिशुनगंज : बांस पर आधारित पुस्तैनी रोजगार करने महार जाति के लोगों के सामने कार्यशील पूंजी व उपयुक्त बाजार के अभाव में धंधा बंदी के कगारपर पहुंच गया है. जिससे इस रोजगार पर आश्रित महाविरादरी परिवारों के सामने रोजी रोटी की समस्या उत्पन्न हो गयी है. चूंकि ऐसे परिवारों के पास न तो उपजाउ भूमि है और न तो दूसरा कोई रोजगार है.

यानी इन लोगों के पास आय का दूसरा कोई साधन नहीं है. बांस से समान निर्मित कर गांव – गांव जाकर बेचना और उससे हुई आमदनी से परिवार का भरण पोषण करना इन लोगों की नियती बन गयी है. हालांकि सुअर पालन का भी काम इन लोगों के द्वारा किया जाता है. लेकिन वे आमदनी तो वर्ष दो वर्ष में एक बार होता है. जिसे परिवार चलाने के लिए उपर्युक्त नहीं मना जा सकता है. आर्थिक स्थिति खराब रहने के कारण ऐसे परिवार के बच्चे स्कूली शिक्षा से भी वंचित रह जाते है. इसका दूसरा भी पहलु हो सकता है.

बांस से बनाये जाते हैं ये सामान
बांस से महार विरादरी के सूप, डघरी, बिनी, डाला, दौड़ा, टोकरी, छिटटा, झांप, फुलदानी व बच्चों के खिलौनों में गिरनी, सुपती, मौनी जैसे अन्य मान उपयोगी समान बनाया जाता है. यह समान खास कर मकौड़ प्रजाति के बांस से बनाया जाता था. लेकिन इस प्रजाति के बांस की खेती काफी हद तक प्रभावित हुआ है. चूंकि बांस का मूल्य काफी कम रहा करता था. ऐसी स्थिति में अब चभा व बन बांस प्रजाति से समान बनाया जाता है. जां बांस महंगा है.
बाजार का अभाव.
बांस से निर्मित समानों की बिक्री के लिए बाजार की कमी है. ऐसी स्थिति में ऐसे परिवार की महिलाओं को गांव – गांव घुम कर निर्मित समान को बेचना पड़ता है. समान बेच कर ही परिवार को भोजन, वस्त्र, दवा व अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है. अगर समान की बिक्री नहीं हुई तो भूखे पेट रह जाना ऐसे परिवार की मजबूरी बन जाती है. भटौनी गांव के लखी मेहतर, सोना मेहतर व चौसा के सूरेंद्र मल्लिक व खुशबू देवी ने बताया कि इस रोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओरसे कुछ भी आर्थिक मदद नहीं पहुंचाया जाता है और न ही उपयुक्त बाजार उपलब्ध हो पाता है. जिसके कारण प्रतिदिन निर्मित समानों की बिक्री नहीं हो पाती है. जिसके चलते हम परिवारों के सामने रोजी रोटी की समस्या उत्पन्न हो जाती है.
रोजगार नहीं है लाभकारी
इस कार्य से जुड़े मुख्यालय के मकेश्वर मेहतर व बिंदु देवी ने कहा कि एक बांस से दस सूप जरूर बन जाता है. लेकिन दस सूप बनाने में दो आदमी को चार से पांच दिन लग जाता है. अगर मजदूरी के तौर पर देखा जाय तो आठ से दस सौ रूपये होता है. जबकि दस सूप बेचने पर दो सौ रूपये बचत आता है. लेकिन उसके लिए भी कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है. अगर बांस का मूल्य कम रहता तो बचत अधिक होता. जिससे परिवार का भरण पोषण आसानी से किया जा सकता था. लेकिन ऐसी बात नहीं है. जबकि डाला, दौड़ा, झांप का रोजगार सिजनल है.
सूद खोरी का शिकार है ये परिवार
महार जाति के लोग वास्तव में काम कर ही खा सकता है. किंतु रोगार करने के लिए पूंजी का सदैव अभाव रहा करता है. ऐसी स्थिति में ऐसे परिवारों को अक्सर महाजों से सूद पर रूपये उठाकर रोजगार किया करते है. जिसके कारण कमाई का बड़ा हिस्सा सूद की राशि चुकाने में चला जाता है. महाजनों को देकर जो रूपया बचता है उसी से परिवार का भरण पोषण किया जाता है. यही वजह रहा करता है कि अधिक आय नहीं हो पा रहा है.
शादी व श्राद्ध क्रम में भी काम आता है सामान . विवाह में भी बांस से निर्मित सजावटी डाला, दौड़ा व अन्य समानों का उपयोग करने की धार्मिक परंपरा रही है. जबकि श्राद्ध कर्म में भी बांस से निर्मित कई समानों का उपयोग करने की परंपरा रही है. लेकिन आधूनिक सामाज ने उस धार्मिक परंपरा व रीति रिवाज को तोड़ते जा रहे है. फलस्वरूप बांस से निर्मित समानों की खपत में कमी आयी है.
फाइवर व प्लास्टिक से निर्मित समान का बढ़ा प्रचलन .
फाइवर व प्लास्टिक से सूप, छोटा – छोटा टूकरी व अन्य निर्मित समानों के बाजार में आ जाने से लोगों का झुकाव उस ओर अधिक हो गया है. जिससे बांस से निर्मित इनप समानों का बाजार में उपयोगिता कम होती जा रही है. जबकि बांस से निर्मित समानों का कोई बाजार ही नहीं है हालांकि महार विरादरी के लोग इसी रोजगार पर आश्रित है. छठ पर्व में बांस निर्मित सूप व टोकरी को ही उपयोग में लाने की धार्मिक परंपरा रही है. लेकिन समृद्ध लोग अब पीतल का सूप बनवाकर छठ पर्व में उपयोग करने लगे है. ऐसे में महार विरादरी के पुस्तैनी रोजगार पर प्रतिकुल असर पड़ना स्वभाविक ही है.
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