मधेपुरा : दस दिनों में मां दुर्गा के पांच रूपों की पूजा श्रद्धा से संपन्न हो गयी. अभी देवी के चार रूपों की पूजा बाकी है. जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ता जा रहा है. लोगों की श्रद्धा लगातार बढ़ती जा रही है. अपने और अपने परिवार के कल्याण के लिए अधिष्ठात्री देवी दुर्गा की मनोयोग से पूजा करने में लोग अधिक से अधिक समय दे रहे हैं. दिन भर सप्तशती के श्लोक व देवी के गीत लाउडस्पीकर पर गूंजते रहते हैं और माहौल को धार्मिकता व समर्पण के रस में सराबोर कर रहे हैं.
प्रतिमा स्थलों पर भी भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है. पूजा आयोजकों की तैयारी भी तेज हो चुकी है. पंडाल निर्माता पंडाल को तो मूर्ति निर्माता मूर्ति में रंग भरने में जुट चुके हैं. सप्तमी की रात प्राणप्रतिष्ठा के बाद देर रात मंदिरों के पट खोल दिये जायेंगे. षष्ठी के दिन बैंडबाजों के साथ धूमधाम से विल्वाभिमंत्रण का विधान होगा. इधर, दुर्गा मंदिरों व पूजा पंडालों के आसपास मेले के काउंटर भी सजने लगे हैं. तीन दिनों के स्थायी काउंटर के अलावे आसपास के कई दुकान भी मेले के रंग में सजने लगे हैं.
अलौकिक सुख की प्राप्ति के लिए कात्यायनी की पूजा आज: नवरात्र के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा का विधान है. मां के इस रूप के प्रकट होने की बड़ी ही अद्भुत कथा है. माना जाता है कि देवी के इसी स्वरूप ने महिषासुर का मर्दन किया था. देवी भागवत पुराण के अनुसार देवी के इस स्वरूप की पूजा गृहस्थों व विवाह के इच्छुक लोगों के लिए बहुत ही फलदायी है. महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया.
महर्षि कात्यायन के नाम पर ही देवी का नाम कात्यायनी हुआ. मां कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं. यह दानवों, असुरों और पापी जीवधारियों का नाश करने वाली देवी कहलाती हैं. सांसारिक स्वरूप में मां कात्यायनी शेर पर सवार रहती हैं. इनकी चार भुजाएं हैं. सुसज्जित आभा मंडल युक्त देवी मां का स्वरूप मनमोहक है. इनके बांए हाथ में कमल व तलवार और दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकित है.
सात चक्रों में आज्ञाचक्र है सर्वश्रेष्ठ : नवरात्र की षष्ठी तिथि के दिन देवी के इसी स्वरूप की पूजा होती है. क्योंकि इसी तिथि में देवी ने जन्म लिया था और महर्षि ने इनकी पूजा की थी. मान्यता के अनुसार, नवरात्र के छठे दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में आज्ञा चक्र का महत्वपूर्ण स्थान है. आज्ञाचक्र मानव शरीर में उपस्थित सात चक्रों में सर्वाधिक शक्तिशाली है. इस दिन ध्यान का प्रयास करने से भक्त को सहज भाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं.
जो भी भक्त मां के इस स्वरूप का पूजन करते हैं, उनके चेहरे पर एक अलग कांति रहती है. वह इस लोक में रहते हुए भी अलौकिक सुख का अनुभव करता है. उसका तेज देखते ही बनता है. नवरात्र के छठे दिन लाल रंग के वस्त्र पहनें. यह रंग शक्ति का प्रतीक होता है. मां कात्यायी को मधु यानी शहद युक्त पान बहुत पसंद है. इसे प्रसाद स्वरूप अर्पण करने से देवी अति प्रसन्न होती हैं.
जिला का पहला मंदिर है अष्टभुजी दुर्गा मंदिर
गम्हरिया. अष्टभुजी दुर्गा मंदिर में भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है. इसकी स्थापना वर्ष 1930 में तत्कालीन जमींदार नागेंद्र नारायण सिंह व सुरेंद्र नारायण सिंह के द्वारा की गई थी. जिला का यह पहला दुर्गा मंदिर है. जहां उर्जा का संवहन श्रीश्री 108 श्री जीवछ मां के मंदिर से अखंड दीप जलाकर प्रारंभ किया जाता है.
यहां पूर्ण तांत्रिक विधि से राजसी दुर्गा पूजा होती है. सप्तमी को पत्रिका प्रवेश के साथ प्रतिमा पूजन आरंभ होता है. महा अष्टमी की रात्रि में पान होने के बाद निशा पूजा आरंभ होता है. महानवमी को त्रिशूलनी पूजा होती है. सप्तमी, अष्टमी व नवमी में भीड़ उमड़ती है. 1930 से आज तक नागेंद्र नारायण सिंह व सुरेंद्र नारायण सिंह के वंशजों के द्वारा भगवती का प्रधान पूजा होता आया है.
